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Class 12th History

Class 12th History ( कक्षा-12 इतिहास दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART- 1

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Q. 1. प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन के विभिन्न स्रोतों का वर्णन करें।

Ans ⇒ सुविधा के दृष्टिकोण से प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के साधनों को दो विस्तृत वर्गों में विभक्त किया जा सकता है, यथा-साहित्यिक सामग्री एवं पुरातात्विक अवशेष। जहाँ पर साहित्य हमारी मदद नहीं करते वहाँ हमें पुरातात्विक सामग्री का सहारा लेना पड़ता है। वैसे तो साहित्यिक साधनों का इतिहास लेखन में अपना महत्त्व है ही, परन्तु तुलनात्मक दृष्टि से पुरातात्विक सामग्री इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह साहित्य में उपलब्ध विवरणों की पुष्टि करने में सहायक सिद्ध होती है।

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साहित्यिक स्रोत

देशी साहित्य – साहित्यिक साधनों में सबसे प्रमुख देशी साहित्य हैं। इनकी भी दो श्रेणियाँ हैं – धार्मिक ग्रन्थ और ऐतिहासिक, अर्द्ध ऐतिहासिक एवं अन्य प्रकार की समकालीन रचनाएँ जो भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है। सबसे पहले हम धर्मग्रन्थों को लें।

ब्राह्मण धर्मग्रन्थ – वेद – धर्मग्रन्थों की श्रेणी में सबसे प्रमख वैदिक साहित्य है। यह आर्यों के आगमन, उनके निवास, उनके प्रसार, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर यथेष्ट प्रकाश डालता है। इन ग्रन्थों में श्रेष्ठतम एवं प्राचीनतम स्थान चार वेदों-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का है। इनमें सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण ऋग्वेद है। इसकी रचना संभवतः आर्य भारत-आगमन के पहले ही कर चुके थे। यह ग्रन्थ आर्यों के प्रारंभिक जीवन के विषय में विस्तृत जानकारी देता है। अन्य वेदों से भी आर्यों के जीवन, उनके क्रियाकलाप, उनके धार्मिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।

ब्राह्मण – वेदों के बाद ब्राह्मण ग्रन्थों का स्थान आता है। ये पद्य में विरचित वेदों की टीका है और मुख्यतया यज्ञों एवं धार्मिक अनुष्ठानों का विवरण प्रस्तुत करते हैं, परन्तु अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर भी इनसे प्रकाश पड़ता है। इनमें सबसे प्रमुख शतपथ ब्राह्मण है। उदाहरणस्वरूप शतपथ ब्राह्मण में राजसूय यज्ञ का जो वर्णन है उससे उत्तर-वैदिककाल में आर्यों की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति की भी झाँकी मिलती है।

आरण्यक और उपनिषद् – आरण्यक और उपनिषद् भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। यद्यपि मूलत: ये भी धार्मिक ग्रन्थ ही हैं, परन्तु इनमें एक नयी बात देखने को मिलती है। ये ग्रन्थ दार्शनिक प्रश्नों, यथा-ईश्वर एवं आत्मा के अस्तित्व पर भी विचार करते हैं। आरण्यक प्रारम्भिक ग्रन्थ हैं जो दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण आरण्यक हैं-ऐतरीय, तैतरीय, मैत्रायणी इत्यादि। इन्हें संहिता भी कहा जाता है।

स्मृति – स्मृति साहित्य भी हमारे लिए काफी महत्त्वपूर्ण है। ये ग्रन्थ विभिन्न विषयों पर ‘प्रकाश डालते हैं। इनमें राजा के अधिकारों एवं कर्तव्यों से लेकर जन-साधारण के सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक विधानों की चर्चा है। यह सत्य है कि ये सभी ग्रन्थ राजनीतिक इतिहास का जानकारी के दृष्टिकोण से बहुत लाभदायक नहीं हैं। परन्तु अन्य विषयों पर इनसे यथेष्ट मदद मिलती है। वस्तुतः स्मृति ने आगे आनेवाले समयों में न्यायिक साहित्य का रूप ले लिया। स्मृतिया में सबसे प्रमुख मनुस्मृति है। याज्ञवल्क्य, विष्णु, वृहस्पति एवं नारद स्मृति भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

बौद्ध एवं जैन धर्मग्रन्थ – ब्राह्मण धर्मग्रन्थों के अतिरिक्त बौद्ध एवं जैन धर्मग्रन्थ भी तत्कालीन इतिहास, सभ्यता एवं संस्कृति पर यथेष्ट प्रकाश डालते हैं। छठी शताब्दी ई० पू० में इन धर्मो के उदय तथा उसके बाद के समय में इनके प्रसार के चलते बौद्ध एवं जैन धर्मग्रन्थों की रचना ले पैमाने पर हुई। ये ग्रन्थ भी ब्राह्मण धर्मग्रन्थों की तरह ही मुख्यतः धर्म प्रधान नहीं हैं।

महाकाव्य – महाकाव्यों में सबसे प्रमुख महाकाव्य हैं-रामायण और महाभारत। वाल्मीकि कत रामायण में एक आदर्श राजा एवं राज्य का विवरण है। इस ग्रन्थ से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन पर यथेष्ट प्रकाश पडता है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रामायण का उतना महत्त्व नहीं है जितना कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से। इसके निश्चितकाल के विषय में विद्वानों में मतभेद है, परन्तु यह भी माना जाता है कि इसका अन्तिम संकलन गुप्तकाल में हुआ होगा।

पुराण – महाकाव्यों के अतिरिक्त पुराणों से भी इतिहास की यथेष्ट जानकारी मिलती है। इनका राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक अवस्था तथा इतिहास के लिए काफी महत्त्व है। प्राचीन राजवंशों के इतिहास के विषय में इनसे जानकारी मिलती है। उदाहरणस्वरूप, शिशुनागवंश, नन्दवंश, मौर्यवंश से लेकर गुप्तवंश तक के राजनीतिक इतिहास की झाँकी इनमें मिलती हैं। सांस्कृतिक महत्त्व के प्रश्नों पर तो पुराणों में काफी महत्त्वपूर्ण सामग्री भरी पड़ी है। इनकी भी रचना गुप्तकाल में और उसके बाद के समय में हुई है। इनसे तिथि के विषय में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती है।

अर्थशास्त्र – पुराणों के बाद हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र को रख सकते हैं। यह ग्रन्थ धार्मिक दष्टिकोण से परे होकर नीतिशास्त्र पर बहुत अच्छी सामग्री प्रस्तुत करता है। अनुश्रुतियों के अनुसार इसके लेखक मौर्यवंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के महामन्त्री चाणक्य, कौटिल्य या विष्णुगुप्त थे। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इसकी रचना मौर्यकाल में ही हुई होगी, यद्यपि कुछ आधुनिक विद्यानों का विचार है कि इसमें मौर्योत्तरकालीन समाज एवं राजनीति की भी चर्चा है। इस ग्रन्थ में राजतन्त्र, प्रशासन, समाज और आर्थिक व्यवस्था से सम्बन्धित अनेक तत्त्वों का सुन्दर संकलन है। यूनानी राजदूत मेगास्थनीज द्वारा दिये गये विवरणों से काफी अंश में इनमें समानता है। इनमें शक नहीं कि मौर्य एवं मौर्योत्तर काल के लिए कौटिल्य का अर्थशास्त्र काफी महत्वपूर्ण है। इसका महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है कि यह सम्भवतः नीतिशास्त्र पर प्राचीनतम ग्रन्थ है।

विदेशी साहित्य एवं यात्रा -विवरण – सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के समय बहुत-सारे इतिहासकार और यात्री भारत आये। उनलोगों ने तत्कालीन व्यवस्था का अच्छा वर्णन किया है। उनके मूल लेख अभी उपलब्ध नहीं है। बाद के ग्रीक एवं लैटिन ग्रन्थों में उनका जिक्र मिलता है। इस कोटि में आरिस्टीहुलत, निआर्कस चारस, यूमेनीरस आदि प्रमुख है। सिकन्दर के बाद भी यूनानी यात्रियों का भारत में आगमन जारी रहा। मेगास्थनीज, जो यूनानी शासक सेल्युकस का राजदूत था, चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में पाटलिपुत्र आया था। उसने अपनी पुस्तक इंडिका में उस काल के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है। मेगास्थनीज के इंडिका और कौटिल्य के अर्थशास्त्र के विवरणों में खासकर पाटलिपुत्र का वर्णन और इसके प्रशासन के विषय में समानता देखने को मिलती है।

चीनी विवरण- ग्रीक और रोमन यात्रियों के विवरणों के अतिरिक्त चीनी यात्रियों के विवरण भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। इनके विवरण का महत्त्व इसलिए अधिक हो जाता है कि ये स्वयं भारत के विभिन्न भागों में बौद्ध ग्रन्थों की खोज में घूमे और उस समय की अवस्थाओं का विवरण दिया। चीनी लेखकों में सर्वप्रथम शुमाचीन का स्थान आता है। इसके लेखों में भारतीय इतिहास की झलक मिलती है। फाहियान जो गुप्तकाल में भारत आया था, उसके विवरण से तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक अवस्था पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। ह्वेनसांग (युवानच्चांग) सातवीं शताब्दी में भारत आया था और हर्षवर्द्धन के समय की अवस्था का जिक्र करता है। हालाँकि इन लेखकों के विवरणों में भी धार्मिक पक्षपात की भावना देखने को मिलती है, फिर भी उनके महत्त्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। चीनी यात्री इत्सिंग और तिब्बती लामा तारानाथ के विवरण भी हमारी प्रचुर सहायता करते हैं।

अरबी एवं मसलमानी विवरण – इस्लाम धर्म के उदय और प्रसार होने से बहुत-से अरब और मुसलमान यात्रौं भी भारत आए और यहाँ की अवस्था का वर्णन अपने ग्रन्थों में किया। ऐसे लखकों में अबिलादरी, सलेमान मिनहाजुद्दीन, अलम मसूदी आदि प्रसिद्ध हैं, परन्तु मुसलमान लेखकों में सबसे महत्त्वपूर्ण कृति अलबरुनी की तहकीके हिन्द है। महमूद गजनी आक्रमण के समय की दशा का इसमें अच्छा वर्णन है। इन सभी विवरणों के आधार भारतीय इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

पुरातात्विक स्रोत

उत्खनन – परातात्विक सामग्री की कोटि में सबसे प्रमुख हैं-उत्खनन द्वारा प्राप्त कर वस्तएँ विभिन्न प्रकार की होती हैं, जैसे-प्राचीन भवनों के स्मारक, मृण मूर्तियाँ, मिट्टी के मिट्टी के खिलौने, सिक्के, हथियार इत्यादि। ये किसी काल और जातियों द्वारा प्रयुक्त वस्तो वास्तविक जानकारी देकर उस काल की सभ्यता एवं संस्कृति की जानकारी प्राप्त करने में देते हैं। आज हड़प्पा या सिंधुघाटी सभ्यता के विषय में हमारी जानकारी पूर्णत: पुरातात्विक पर ही आधारित है। प्रागैतिहासिक काल, उसके पहले और बाद के काल के इतिहास के लि उत्खननों द्वारा महत्त्वपूर्ण सामग्रियाँ प्रकाश में लायी गयी हैं और उनसे इतिहास के विभिन्न पहले पर प्रकाश पड़ता है।

अभिलेख – पुरातात्विक सामग्री की कोटि में दूसरा प्रमुख स्थान अभिलेखों का आता है। अभिलेख विभिन्न प्रकार के होते हैं, जैसे-गुफालेख, शिलालेख, स्तम्भलेख, ताम्रपत्र, मुहरों पर अभिलेख इत्यादि। ये विभिन्न विषयों पर प्रकाश डालते हैं। सबसे प्राचीन अभिलेख सिन्ध घाटी की मुहरों पर मिले हैं परन्तु इनको अभी तक ठीक ढंग से पढ़ा नहीं जा सका है। यद्यपि इस दिशा में निरन्तर प्रयास जारी है। ऐतिहासिक काल में सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण अशोक के अभिलेख हैं। इनमें उस काल की महत्त्वपूर्ण घटनाओं-कलिंगयुद्ध सम्राट की नीति में परिवर्तन, प्रशासनिक सुधार, आर्थिक व्यवस्था आदि के विवरण प्राप्त होते हैं। उत्तर मौर्यकालीन अभिलेखों में कलिंग के शासक खारवेल का हाथीगुफा अभिलेख, रुद्रदमन का जूनागढ़ अभिलेखों आदि प्रमुख हैं।

सिक्के – अभिलेख के बाद सिक्कों का स्थान आता है। वैसे तो सिक्के आर्थिक इतिहास की जानकारी के मुख्य साधन हैं, परन्तु इन पर उत्कीर्ण लेखों से प्रशासनिक बातों पर भी प्रकाश पड़ता है। तिथि निर्धारण में भी इनसे सहायता मिलती है।

प्राचीन स्मारक – इन पुरातात्विक सामग्रियों के अतिरिक्त प्राचीन भवन, मंदिर, गुफा, मूर्तियों आदि के अध्ययन से तत्कालीन इतिहास की जानकारी मिलती है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, तक्षशिला, कौशाम्बी आदि से प्राप्त भवनों के अवशेष उस समय की नगर-निर्माण योजना पर प्रकाश डालते हैं। गान्धार कला का ज्ञान तक्षशिला और उसके आसपास से. प्राप्त मूर्तियों के आधार पर होता है। इसी प्रकार मथुरा की मूर्तियाँ भी मथुरा कला के विषय में जानकारी देती है। साँची, भरहुत, मथुरा के स्तूप तथा उनपर चित्रित मूर्तियों से बुद्ध के जीवन की झाँकी मिलती है। अजन्ता, एलोरा, एलीफैन्टा की गुफाएँ भी तत्कालीन कला एवं शिल्प का ज्ञान कराती हैं। विदेशों में भी भारतीय कला के अवशेष स्थित है जो भारत का उन देशों से घनिष्ठ सम्बन्ध बतलाते हैं जैसे-बामियान (अफगानिस्तान) की विशाल बुद्ध की प्रतिमा, कम्बोडिया के अंकोरवाट तथा जावा के बोरोबुदुर के मन्दिर एवं अन्य अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। मध्य एशिया और रोमन साम्राज्य हिस्सों से प्राप्त विभिन्न भारतीय मूल की वस्तुएँ, जैसे-पौम्पेई से प्राप्त लक्ष्मी की हाथीदाँत की मूर्ति तथा भारत में विदेशों की बनी वस्तुएँ, जैसे-रोमन शासकों के सिक्के, शराब रखने के बर्तन आदि को देखने से भारत का इन देशों के साथ सम्बन्ध पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।

इस प्रकार प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के अनेक साधन हैं। हरेक का अपना अलग महत्त्व है। जितना महत्त्व साहित्यिक सामग्री का है उतना ही महत्त्व पुरातात्विक सामग्री का भी है परन्तु तुलनात्मक दृष्टि से पुरातात्विक सामग्री ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। फिर भी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और बिना दोनों साधनों के उचित प्रयोग के प्राचीन भारतीय इतिहास की सही जानकारी नहीं हो सकती है।


Q.2. हड़प्पा सभ्यता के नगर-निर्माण की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।

Ans ⇒ हड़प्पा संस्कृति में कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जिनको सामने रखकर कुछ इतिहासकार अब यह मानने लगे हैं कि अवश्य ही यह सभ्यता, अन्य सभ्यताओं से श्रेष्ठ है और इसकी ससार को बडी देन हैं। निम्नलिखित क्षेत्रों में सिन्धु घाटी के लोगों की उन्नति उनकी श्रेष्ठ सभ्यता का स्पष्ट प्रमाण है –

1. श्रेष्ठतम तथा सुनियोजित नगर (Best and well planned city)- हड़प्पा के नगरा का स्थापना ऐसे मनोवैज्ञानिक एवं सुनियोजित ढंग से की गई थी जिसका उदाहरण प्राचीन संसार में कहीं नहीं मिलता । आज की भाँति आवश्यकतानुसार सड़कें व गलियाँ छोटी और बड़ा दाना प्रकार की बनाई गई थीं। डॉ. मैके जैसे लोग भी इन नगरों की प्रशंसा किये बिना न रह सके। उनके कथनानुसार गलियाँ एवं बाजार इस प्रकार के बनाये गये थे कि वाय अपने आप ही उनको साफ कर दे।

2. श्रेष्ठतम, सुनियोजित एवं सुव्यवस्थित निकास व्यवस्था (Best and well planned drainage)-सफाई का जितना ध्यान यहाँ के लोग रखते थे, उतना शायद ही किसी दूसरे देश के लोग रखते हों। इतनी पक्की और छोटी-छोटी नालियाँ आजकल भी हमें आश्चर्य में डाले बिना नहीं रहतीं।

3. श्रेष्ठतम व निपुण नागरिक प्रबंध (Best and the most efficient civilorganization)नगर प्रबंध भी सर्वोत्तम ढंग का था। ऐसा संसार के किसी दूसरे प्राचीन देश में देखने में नहीं आता। स्थान-स्थान पर पीने के पानी का विशेष प्रबंध था। गलियों में प्रकाश का भी प्रबंध था। यात्रियों के लिए सराएँ और धर्मशालाएँ बनी हुई थीं और नगर की गंदगी को बाहर ले जाकर खाइयों में डलवा दिया जाता था। वे लोग आधुनिक युग की भाँति स्वास्थ्य के नियमों से अच्छी तरह परिचित थे। इसलिये तो उन्होंने बर्तन बनाने की भंट्टी को भी नगर के अंदर नहीं बनने दिया था।

4. सुन्दर और उपयोगी कला (Art both with beauty and utility)- यहाँ की कला में दा. विशेष गुण थे, जो अन्य देशों की कला में एक साथ देखने को कम मिलते हैं- (i) इस सभ्यता में बनावटीपन लेशमात्र को भी न था। इसके घरों अथवा भवनों का निर्माण लोगों की उपयोगिता या आराम को ध्यान में रखते हुए हुआ था। (ii) उपयोगिता के साथ-साथ मकानों में सुन्दरता भी थी। मेसोपोटामिया के मकान चाहे अधिक सुंदर व अच्छे हों, परंतु उनमें कृत्रिमता अधिक थी और वे इतने उपयोगी भी नहीं थे। उधर, मिस्र में भवन तो अनेक थे परंतु उनमें कला का अभाव है।


Q.3. Who were the author of the Harappan culture ? Discuss the salient features of this culture.(हड़प्पा संस्कृति के निर्माता कौन थे ? इस संस्कृति की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख करें।)

Ans ⇒ एक लम्बी अवधि तक इतिहासकारों का मत था कि भारतवर्ष में सभ्यता का प्रारंभ आर्यों के आगमन के बाद हुआ और वैदिक सभ्यता को ही भारत की प्राचीनतम सभ्यता माना जाता था, किन्तु सिन्धु प्रान्त में स्थित हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से जो अवशेष प्राप्त हए वे एक नयी सभ्यता पर प्रकाश डालते हैं। उत्खनन से वस्तुओं के अवशेषों से पता चलता है कि आर्यों के आगमन के पहले ही सिन्धुघाटी में एक उच्च कोटि की सभ्यता विकसित हो चकी थी जो मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता की समकालीन थी। इस सभ्यता के नगर योजना के अनुसार बनाये गये थे। यहाँ का समाज मातृसत्तात्मक था। लोग बहुदेववादी थे। कृषि, पशुपालन, व्यापार और उद्योग-धन्धे जीविका के प्रमुख साधन थे। सामान्यतः 1500 ई०पूर्व में बाढ़, अग्निकाण्ड और बाह्य आक्रमण के कारण इस सभ्यता का अंत हो गया।

सिन्धुघाटी सभ्यता का क्षेत्र – सिन्धुघाटी सभ्यता का प्रसार-क्षेत्र आधुनिक खोजों के आधार पर काफी विस्तृत हो गया है। पश्चिमी पंजाब और सिन्ध में यह सभ्यता समान रूप से फैली ह थी। इस सभ्यता का प्रभाव गंगा, यमुना, नर्मदा और ताप्ती नदियों की घाटियों तक था। उत्तर-पर्व में रोपड़ तक इसका प्रभाव था। गंगा की घाटी में भी इस सभ्यता के अवशेष मिले हैं। पूर्व में काठियावाड़ से पश्चिम में मकरान तक यह सभ्यता फैली हुई थी। राजस्थान की कालीबंगा और गुजरात की लोथल नामक जगह एवं उसके आगे तक भी इस सभ्यता के अवशेष पाये गये हैं। इसके एक मख्य केन्द्र हड़प्पा के नाम के आधार पर इसे ‘हड़प्पा की सभ्यता’ भी कहा जाता है।

सिन्धुघाटी सभ्यता का समय – प्राचीन इतिहास में समय-निधारण एक जटिल 10 सिन्धु घाटी सभ्यता के साथ भी यही बात है। इस सभ्यता की उत्पत्ति कब हुई, इस सं . विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किये हैं। सर जॉन मार्शल ने इस सभ्यता का काल 3250 ई० पू० से 2750 ई. तक माना है। कुछ अन्य लोगों का विचार है कि यह सभ्यता 2200 ई. प. 1500 ई. पू. तक फलती-फूलती रही। गाईन चाइल्ड के अनुसार ई. पू. 3000 के आरम्भ यह सभ्यता विकसित हुई होगी। कछ लोग इसे मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं समकालीन मानते हैं, लेकिन अब तिथि-निर्धारण के नये तरीके निकाले गये हैं जिनके अनुसार द सभ्यता का काल 2350 ई० पू. से 1750 ई. पू. तक माना जाता है।

सिन्धु सभ्यता के निर्माता – अब इस बात पर भी विचार कर लेना आवश्यक है कि सभ्यता के निर्माता कौन थे ? इस सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। कुछ विद्वानों की पार है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता वही आर्य थे जिन्होंने वैदिक सभ्यता का निर्माण किया था, परन्त यह मत ठीक नहीं लगता, क्योंकि सिन्धु सभ्यता तथा वैदिक सभ्यता में इतना बड़ा अन्तर है कि एक ही लोग इन दोनों के निर्माता नहीं हो सकते। कुछ विद्वानों के विचार में सिन्धु सभ्यता के निर्माता सुमेरियन जाति के थे। एक विद्वान के विचार में सिन्धु सभ्यता के निर्माता वही असर जिनका वर्णन वेदों में मिलता है। डॉ० राखालदास बनर्जी के विचार में सिन्धु सभ्यता के निर्माता द्रविड़ लोग थे चूँकि दक्षिण भारत में द्रविड़ों के मिट्टी और पत्थर के बर्तन तथा उसके आभूषण सिन्धुघाटी के लोगों के बर्तनों तथा आभूषणों से मिलते-जुलते हैं, अतएव यह मत अधिक प्रतीत होता है, परन्तु खुदाई में जो हड्डियाँ मिली हैं, वे किसी एक जाति की नहीं हैं, वरन् वे विभिन्न जातियों की हैं। अतएव, कुछ विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता मिश्रित जाति के थे। यही मत सबसे अधिक ठीक लगता है।

सिन्धु सभ्यता का स्वरूप – यह सभ्यता प्रस्तर-धातुयुगीन सभ्यता थी, क्योंकि उत्खनन से दोनों के अवशेष मिले हैं। खुदाई में साम्राज्य, युद्ध और सैन्य संगठन संबंधी कोई वस्तु नहीं मिली है। अस्त्र-शस्त्र का सर्वथा अभाव है। यहाँ तक कि राजाओं के नाम भी नहीं मिलते हैं। इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह सभ्यता शांतिमूलक थी। यह सभ्यता व्यापार-प्रधान और शहरी थी। लोग नागरिक जीवन व्यतीत करते थे और प्रत्येक वस्तु को उपयोगिता की दृष्टि से देखते थे। बड़े-बड़े नगरों की स्थापना की गयी थी और विदेशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किया गया था। विशाल भवन और स्नानागार उस समय के लोगों के सामूहिक जीवन के द्योतक हैं, अतएव कुछ लोगों का मत है कि यह सभ्यता लोकतंत्रात्मक थी, क्योंकि राजाओं के अस्तित्व का पता नहीं चलता है, परन्तु वहाँ के निवासियों की शांतिमूलकता एवं अपरिवर्तनवादी स्वभाव से इस बात का संकेत मिलता है कि धर्म का प्रभाव राजनीति पर भी था।

सिन्धु सभ्यता की विशेषताएँ –

कांस्य सभ्यता – सिन्धु घाटी की सभ्यता को ‘ताम्रयुगीन सभ्यता’ कहते हैं क्योंकि तॉब के हथियारों एवं अन्य वस्तुओं की बहुतायत थी। पत्थर से भी अस्त्र-शस्त्र बनाये जाते थे। बाद में बहुत पैमाने पर काँसे के औजारों और अन्य वस्तुओं का निर्माण होने लगा। काँसे की प्रधानता रहने के कारण ही इस सभ्यता को कांस्यकालीन सभ्यता कहते हैं।

नागरिक सभ्यता – सिन्धु सभ्यता के निवासियों का आर्थिक जीवन औद्योगिक विशिष्टीकरण और स्थानीयकरण पर आधारित था। प्रत्येक व्यवसायी एक ही प्रकार का व्यवसाय करता था और समान व्यवसायवाले एक ही मुहल्ले में रहते थे। यह सभ्यता व्यापार प्रधान सभ्यता थी। बड़े-बड़े नगरों की स्थापना की गयी थी और विदेशों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किया गया था।
यह सभ्यता नागरिक भी थी, क्योंकि विशाल नगर, पक्के भवन, सुव्यवस्थित नालिया, सड़क एवं सार्वजनिक स्नानागार का निर्माण, सुदृढ़ शासन व्यवस्था-ये प्रमाणित करते हैं कि साधारण नागरिकों की सुख सुविधा पर भी ध्यान दिया जाता था। संभवतः समकालीन अन्य सभ्यताओं में नागरिकों की सुख-सुविधा पर इतना अधिक ध्यान कहीं नहीं दिया गया था।

(iii) जनतांत्रिक सभ्यता – उत्खनन से प्राप्त उत्खनन से प्राप्त विशाल सभाभवन और स्नानागार सिन्धुवासियों के सामूहिक जीवन के प्रतीक हैं। सिन्ध प्रदेश में राजा राजप्रासाद और शाही खजाने का काइ प्रमाण नहीं मिला है। शासन के दो प्रधान केन्द्र थे-हडप्पा और मोहनजोदडो। उत्तरी भाग का शासन हड़प्पा और दक्षिणी भाग का शासन मोहनजोदडो से संचालित होता है। इस प्रकार लोकतात्रिक हात हए भी शासन व्यवस्था नियंत्रित थी।

(iv) औद्योगिक सभ्यता – मिशन के निवासियों के आर्थिक जीवन का आधा व्यापार और उद्योग-धन्धा था। उनका व्यापार दर-दर देशों से होता था। अनेक प्रकार उद्योग-धन्धों का भी विकास हुआ था। आर्थिक जीवन उद्योगीकरण और स्थानीकरण पर आधारित था। ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्ध-सभ्यता में श्रम विभाजन और संगठन की भी व्यवस्था था। एक व्यक्ति एक ही व्यवसाय करता था और एक प्रकार के व्यवसाय करने वाले लोग एक हा क्षार निवास करते थे।

(v) शातिमूलक सभ्यता – सिन्ध सभ्यता के निवासी शांतिप्रिय थे। कवच ढाल, शिरस्त्राण आदि युद्ध में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों का अभाव है। उत्खनन से प्राप्त भाला, कुल्हाड़ा, धनुष-बाण उनकी सामाजिक प्रवृत्ति के द्योतक नहीं हैं। इन उपकरणों का प्रयोग आखेट युग म होता था।


Q.4. हड़प्पा सभ्यता के पतन के प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए।

Ans ⇒ हड़प्पा सभ्यता के पतन के मुख्य कारणों की चर्चा निम्नलिखित रूप से की जा सकती है

(i) बाढ़ – इस मत के अनुसार हडप्पा सभ्यता के प्रमख नगर नदियों के ही किनारे थे। अत: बाढ़ द्वारा इनका पतन हुआ होगा। खुदाई में मिली बालू की मोटी परतें इस मत की पुष्टि करती है।

(ii) अग्निकांड – खुदाई में जली हुई मोटे स्तरों की प्राप्ति से कुछ विद्वान अग्निकांड से इस सभ्यता के पतन की बात करते हैं।

(iii) बाह्य (आर्य) आक्रमण – खुदाई से प्राप्त नरकंकालों, वेदों में दस्यओं दर्गों के विनाश का वर्णन के आधार पर बाह्य आक्रमण द्वारा पतन के विचार को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

(iv) लगातार गेहूँ उत्पादन से भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी से भी इस सभ्यता के पतन के विचार को बल मिलता है।
इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन, नदियों द्वारा मार्ग बदलने, जलप्लावन के सिद्धान्त भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।


Q.5. सिन्धु घाटी सभ्यता के पतन के कारणों को बतावें।

Ans ⇒ सिन्धु सभ्यता करीब 600 वर्षों तक चलती रही (2300-1750 ई० पू० )। 1700 ई० पू० के आस-पास इस सभ्यता का पतन प्रारंभ हुआ। इसके दो प्रमुख केन्द्र हडप्पा और मोहनजोदड़ो इस समय तक नष्ट हो चुके थे। इन जगहों पर नगर-निर्माण की व्यवस्था ढीली पड चकी थी मकान बिना किसी योजना के बनाए जाने लगे। पुराने बड़े मकान खंडहर बन चुके थे। सडकों एव नालियों की व्यवस्था नष्ट हो चुकी थी। नए प्रकार के मृभांड व्यवहार में आने लगे तो स्पष्ट हो जाता है कि यह सभ्यता अब पतन के मार्ग पर बढ़ चली थी। अन्य केन्द्रों पर यह सभा पतनोन्मुख स्वरूप में कुछ और अधिक दिनों तक चली, परंतु इसकी प्राचीन गरिमा नष्ट हो चुकी थी।
कुछ विद्वानों की धारणा है कि आर्यों के आक्रमण या विदेशी आक्रमण ने इस सभ्यता को नष्ट कर दिया। मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों पर तेज हथियारों के घाव के निशान हैं, जो बाह्य आक्रमण की धारणा की पुष्टि करते हैं। परंतु ये आक्रमणकारी आर्य थे या अन्य कोई बर्बर जाति वाले यह निशिचत करना कठिन है। इनके आक्रमण से शान्तिमय सिन्धु सभ्यता को क्षति तो पहुँची लेकिन सिर्फ इसी के कारण यह सभ्यता नष्ट नहीं हुई। इस सभ्यता के विनाश के लिए अन्य
आंतरिक एवं भौगोलिक कारण भी उत्तरदायी थे। आधुनिक अनुसंधानों से यह बात अब जा रही है कि बाहा आक्रमण के पूर्व ही आंतरिक कारणों से कुछ नगरों का पतन प्रार था। इसके लिए बहुत अंश तक अग्नि को उत्तरदायी माना जाता है। 1700 ई० प० के उत्तरी बलूचिस्तान के अनेक स्थलों से भीषण अग्निकांड के प्रमाण मिलते हैं। संभवत में भी ऐसा अग्निकांड हुआ हो। दूसरी संभावना भीषण बाढ़ की है। मोहनजोदडो की बाद द्वारा लाई गई बलुही मिट्टी की परतें मिली हैं। चूंकि इस समय के नगर नदियों के हुए थे, इसलिए बाढ़ से उनके नष्ट होने की संभावना है। कुछ विद्वानों का विचार है कि बडी महामारी (प्लेग या मलेरिया) के प्रकोप से भी बहुत अधिक व्यक्तियों की मृत्य हो गई। इससे सभ्यता को आघात पहुँचा। इनके अतिरिक्त, नदियों की धारा में परिवर्तन, उनके नगरों में हट जाने के कारण आर्थिक व्यवस्था को क्षति पहुँची होगी। इसी प्रकार राजपूताना रेगिस्तान बढ़ते प्रभाव ने सिन्धुघाटी की उर्वरा-शक्ति को कम कर दिया, जिसके कारण कृषि एवं आर्थिक आधार को गहरा धक्का लगा। ऐसा भी अनुमान है कि मोहनजोदड़ो के पास हुए विवर्तन हलचलों (Tectonic disturbances) ने जल का स्तर काफी ऊँचा उठा दिया एवं समस्त सिन्ध प्रदेश जलाप्लावित हो गयी।
इन भौगोलिक कारणों के अतिरिक्त आर्थिक कारण भी इस सभ्यता के पतन के लिए जिम्मेदार थे। सिन्धु सभ्यता का जिन देशों के साथ व्यापारिक संबंध था, वहाँ की राजनीतिक स्थिति 17वीं-16वीं शताब्दी ई. पू. में अस्थिर थीं। ऐसी स्थिति में व्यापार को धक्का लगा, जिसने सिन्धु सभ्यता के आर्थिक आधार को कमजोर कर दिया। जनसंख्या में वृद्धि, प्राकृतिक साधनों में कमी तथा आर्थिक अस्थिरता भी इस सभ्यता के पतन के लिए उत्तरदायी थीं। कुछ विद्वानों का विचार है कि हड़प्पा संस्कृति के मूलभूत तत्त्वों में परिवर्तन, इस सभ्यता का बर्बर स्वरूप हो जाना, इसके पतन का एक प्रमुख कारण था। इन अनेक कारणों ने सिन्धु सभ्यता को नष्ट कर दिया; परंतु यह सभ्यता विलुप्त नहीं हो गई।


Q.6. गणतंत्र और वर्ण में संबंध स्थापित करें।

Ans ⇒ प्राचीन भारत में सैद्धांतिक रूप से राजतंत्र और वर्ण में गहरा संबंध था। अर्थशास्त्र पर धर्मसूत्रों में इस बात पर बल दिया गया है कि राजा को क्षत्रिय वर्ण का होना चाहिए। शास्त्रों में वर्णित यह व्यवस्था सदैव कारगर नहीं होती थी। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ क्षत्रियों को राज्य करते हुए दिखलाया गया है। उदाहरण के लिए नंदवंशी शूद्र थे, मौर्यों को शद्र, क्षत्रिय अथवा निम्न कुलोत्पन्न माना गया है। शुंग, सातवाहन ब्राह्मण थे। भारत आने वाले मध्य एशियाई राजाओं को यवन या मलेच्छ माना गया है। अनेक विद्वान गुप्त शासकों को यवन मानते हैं। इस प्रकार सेद्धातिक रूप से क्षत्रिय को ही आदर्श राजा के रूप में मान्यता थी। परंत व्यावहारिक रूप से किसी भी वर्ग का व्यक्ति शक्ति संसाधन सम्पन्न होकर राजा बन जा सकता है।


Q.7. वैदिक काल से आप क्या समझते हैं ? उस काल की सभ्यता का वर्णन करें। अथवा, वैदिक काल के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन का वर्णन करें। अथवा, वैदिक काल के समाज और धर्म पर प्रकाश डालिए।

Ans ⇒  वेद आर्यों के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें ऋग्वेद सबसे प्राचीन है। आर्यों की सभ्यता की पर्ण जानकारी उनके वेदों से होती है। उस काल में आर्यों के प्रचलित सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन बहुत ही उन्नत अवस्था में थे । आर्यों के उस काल के इतिहास को वैदिककाल कहा जाता है। उनके उन्नत जीवन का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है-

सामाजिक जीवन – आर्यों का सामाजिक संगठन मुख्यतः वर्ण व्यवस्था पारा वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति श्रम विभाजन के आधार पर हुई। पर उस समय मानसिक, बौद्धिक ओर आध्यात्मिक कार्यों के लिए ब्राह्मण, युद्ध और राजनीतिक कार्यों के लिए क्षत्रिय, आर्थिक कार्यों के लिए वैश्य और समाजसेवा के लिए शूद्र थे। एक वर्ण से दूसरे वर्ण में परिवर्तित होना संभव था। वंश परंपरा से इसका कोई संबंध नहीं था। इसमें पारस्परिक खान-पान आदान-प्रदान और विवाह आदि होता रहता था। इसमें धीरे-धीरे जटिलता आने लगी। इससे सामाजिक विकास में बाधाएँ उत्पन्न होने लगीं।

सुखी पारिवारिक जीवन – आर्यों के सामाजिक संगठन का आधार परिवार था। परिवार का स्वामी परिवार का सबसे वृद्ध पुरुष होता था। उसे गृहपति कहा जाता था। परिवार के सभी सदस्यों को गृहपति की आज्ञा माननी पड़ती थी। वह भी अपने परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की पर्ति करता थी। बच्चों के ऊपर पिता का कठोर नियंत्रण रहता था। उस समय संयुक्त परिवार का प्रथा प्रचलित थी।

समाज में नारी का स्थान – आर्यों के सामाजिक जीवन में नारियों को उच्च स्थान प्राप्त था। वे अपने पति के साथ धार्मिक कार्यों में भाग लेती थीं। उन्हें उच्चतम शिक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता थी। घोषा, लोपामुद्रा, विश्ववारा अपाला आदि महिलाओं की गणना ऋषियों के रूप में होती थी। पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा आदि कुप्रथाओं का प्रचलन नहीं था। विवाह एक पवित्र बंधन समझा जाता था। विवाह के समय देवताओं को साक्षी करके वर-कन्या दोनों जावनभर के साथी बनने को परस्पर प्रतिज्ञा करते थे। इस तरह पारिवारिक जीवन सुखमय था। समाज म स्त्रियों को उच्च स्थान प्राप्त था। समाज में तलाक की प्रथा प्रचलित नहीं थी।

भोजन और वस्त्र – आर्य शाकाहारी और मांसाहारी दोनों थे। उनका आहार दूध, घी, फल, मक्खन जैसे पौष्टिक पदार्थ थे। गेहूँ और जौ की रोटी तथा शाकभाजी को वे लोग दैनिक भोजन में प्रयोग करते थे। वे मांस खाते थे तथा सोम और सुरा उनके पेय पदार्थ थे। वे लोग ऊनी, सूती और रेशमी तीनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। वे लोग भड़कीले वस्त्रों का प्रयोग करते थे। धनी लोगों के वस्त्र सोने के तारों से बढ़े होते थे। आभूषणों का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों करते थे।

आर्थिक जीवन : आर्यों के आर्थिक जीवन निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित थे –
कृषि – आर्यों का आर्थिक जीवन कृषि पर आधारित था। खेती की सभी प्रक्रियाएँ जुताई, बुआई, सिंचाई और कटाई जानते थे। इस समय की प्रमुख उपज गेहूँ और जौ थी। वे लोग हल और बैलों की सहायता से खेती करते थे। भूमि को उर्वरक बनाने के लिए खाद और सिंचाई का भी प्रयोग करते थे।

पशुपालन – कृषि के साथ पशुपालन उनका महत्त्वपूर्ण रोजगार था। वे लोग गाय को गोधन कहते थे और उनका विशेष महत्त्व रखते थे। वे गाय, बैल, घोड़े, गधे, खच्चर, भेड, बकरियाँ आदि पशु पालते थे। वे जंगली पशुओं, जैसे-हाथी, सूअर, बारहसिंगा आदि का शिकार भी करते थे।

व्यवसाय – आर्य लोग व्यापारियों को ‘पणि’ कहते थे। उनका समाज में एक वर्ग होता था। जल-थल दोनों मार्गों से वे व्यापार करते थे। इस काल में इसका प्रचलन कम था और गाय विनिमय का माध्यम थी। धीरे-धीरे लोग ‘निष्क’ नामक स्वर्ण के आभूषणों को विनिमय के लिए व्यवहृत करने लगे। व्यापारिक संबंध ईरान और बेबीलोनिया से था। भारत से ही पश्चिम एशिया वालों ने कपास की खेती करना सीखा था।

गृह उद्योग – आर्य लोग रथ, हल, गाड़ियाँ आदि बनाते थे। औद्योगिक कलाकारों में बढई का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान था। धातुओं की वस्तुओं का विशेष प्रचलन होने के कारण लोहार और सोनार को भी सम्मानित स्थान प्राप्त था। वस्त्र बुनने के लिए जुलाहे और बुने हुए वस्त्र को र के लिए रंगरेज भी थे। स्त्रियाँ चटाई आदि बुना करती थीं। चमार चमड़े की वस्तुएँ तैयार करता था।

धार्मिक जीवन – आर्यों के धार्मिक जीवन में निम्नलिखित बातों का प्रचलन था
बहुदेववाद की प्रथा – आर्य अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे। ऋग्वेद में 33 कोटि देवताओं का उल्लेख है। सौरमण्डल में सूर्य उनके सबसे मूर्तिमान देवता थे। उनकी उपासना वे कई रूपों में करते थे। इनके अतिरिक्त वृष्टि के देवता इन्द्र, न्याय के देवता वरुण और अग्नि देवता का विशेष महत्त्व था।

यज्ञ की प्रधानता – आर्यों के जीवन में यज्ञ की प्रधानता थी। वे वर्षा होने और महामारी राकने के लिए यज्ञ करते थे। वास्तव में उनका जीवन यज्ञमय था। यज्ञ की व्यापकता के उस समय के भारतीय समाज में परोहितों और ब्राह्मणों का महत्त्व अधिक बढ़ गया था। यज्ञों के विधियों को निर्धारित करने के लिए जो ग्रन्थ बने, उनका नाम ही उनकी जाति के नाम पर ब्राम्हण पड़ा।

नैतिकता पर जोर – वैदिक आर्यों के धार्मिक विचारों पर नैतिकता की स्पष्ट छाप दिला पड़ती है। उनके देवता वरुण नैतिक व्यवस्था द्वारा संसार को चलाते थे। वरुण की प्रशंसा में अनेक ग्रंथ लिखे गये। वरुण प्रत्येक व्यक्ति के पाप-पुण्य को देखते थे और अपराधियों को दण्ड देते परंतु उनमें क्षमाशीलता भी बहुत थी। वे शुद्ध हृदय से प्रार्थना करने पर अपराधों को शीघ्र ही माफ कर देते थे ऐसा विश्वास लोगों का था।

राजनैतिक जीवन : राजतंत्र – उस समय शासन व्यवस्था राजतांत्रिक थी। परंतु एक ता से सीमित राजतंत्र की प्रथा थी। उस पर धर्म का नियंत्रण रहता था। युद्ध के समय राजा नेता के कार्य और शांति के समय न्याय संबंधी कार्य करता था।

नियंत्रण समिति – उस समय राजा की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए सभा और समिति नामक संस्था थी। इसके सदस्य अविभाजित वर्ग के लोग होते थे। ‘सभा’ और ‘समिति’ के वास्तविक स्वरूप के विषय में विद्वानों की धारणाएँ भिन्न-भिन्न हैं, क्योंकि ऋग्वेद में कहीं भी सभा और समिति का निरूपण नहीं किया गया है।

राज कर्मचारी – शासन कार्य में राजा को सहायता प्रदान करने के लिए अनेक राजकर्मचारी होते थे। राजकर्मचारियों में ‘पुरोहित’ ‘सेनानी’ और ‘ग्रामणी’ प्रमुख होते थे। पुरोहितों को शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। वह राजा के धार्मिक कर्तव्यों का पालन करता था और अपनी बहुमूल्य सम्पत्तियों द्वारा उसकी सहायता करता था। सेनानी सेना का प्रधान अधिकारी होता था। इसे राजा स्वयं चुनता था। इनके अतिरिक्त राजकर्मचारी होते थे।

सेना – उस समय तक स्थायी सेना की आवश्यकता का अनुभव नहीं हो पाया था। सेना का नेतृत्व स्वयं राजा करता था। राजा के बाद सेनानी का स्थान था। पैदल और रथ, सेना के मुख्य अंग थे। भाला, धनुष, तलवार और कुल्हाड़ी उस समय के मुख्य शस्त्र थे। युद्ध के लिए सेना के प्रयाण करते समय दुन्दुभि बजाई जाती सेना की व्यवस्था मुख्य रूप से युद्ध के समय की जाती थी।

न्याय व्याबस्था – वैदिक आर्यों की न्याय-व्यवस्था सरल थी। राजा न्याय का सर्वोच्च अधिकारी था। दण्ड-विधान सरल था। मृत्यु-दण्ड अज्ञात था और हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए भी मृत्यु दण्ड नहीं दिया जाता था।


Q.8. वैदिककालीन के दर्शन, साहित्य, विज्ञान और कला का वर्णन कीजिए। भारत में आर्य सभ्यता की क्या देन है ?

Ans ⇒  पूर्व और उत्तर वैदिक काल के जीवन में बहुत अंतर हो गया। उत्तर वैदिककाल में धार्मिक सरलता समाप्त हो गई और धर्म का रूप यांत्रिक हो गया। इसी तरह जीवन के अनेक क्षेत्रों में पूर्व वैदिककाल की अपेक्षा उत्तर वैदिककाल में काफी परिवर्तन आया। इनका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है

षड्दर्शन – पूर्व वैदिक काल की अपेक्षा उत्तर वैदिक काल में भारतीय दर्शन का काफी विकास हुआ। इस काल में अनेक ऐसे दार्शनिक हुए जिन्होंने प्रकृति और परमात्मा संबंधी रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया। फलत: दो प्रकार के दर्शनों का विकास हआ- (i) आस्तिक दर्शन, जो वेदों को स्वीकार करता है और (ii) नास्तिक दर्शन, जो वेदों में विश्वास नहीं करता है। न्याय, सांख्य, योग, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत आस्तिक दर्शन के छ: रूप हैं।

साहित्य ओर बिज्ञान – पूर्व वैदिक काल की अपेक्षा उत्तर वैदिक काल में मल्यवान ग्रथा की रचना की गई। इसी युग में अन्य तीन वेदों-सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद नामक तीन बेदो की रचना हुई तथा श्रुति, स्मृति, ब्राह्मणग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद, वेदांग, उपवेद, सूत्र आदि लिखे गए । विज्ञान के क्षेत्र में भी उत्तर वैदिक काल में आर्यों ने गणित, खगोल विद्या, ज्यामिति, योतिषशास्त्र, शरीर विज्ञान इत्यादि के क्षेत्र में काफी प्रगति की। वैदिक साहित्य का काफी महत्त्व है। वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ हैं। इससे स्पष्ट है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति विश्व में सबसे अधिक प्राचीन है। वैदिक साहित्य आर्यों के शारीरिक शक्ति, मानसिक प्रतिभा और आध्यात्मिक चिंतन का द्योतक है। हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांत वैदिक ग्रंथों में ही वर्णित है।

कला – वैदिक काल में लेखनकला का विकास नहीं हो पाया था। अत: शिक्षा का स्वरूप मौखिक था। पाँच वर्ष की आयु में उपनयन-संस्कार के बाद बच्चे गुरुकुल भेज दिए जाते थे। वहाँ वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्याध्ययन करते थे। वे गुरु की सेवा करते थे और भिक्षाटन कर पेट भरते थे। उन्हें वेद, उपनिषद्, इतिहास, पुराण, व्याकरण, दर्शन, गणित, नक्षत्रविज्ञान, धनुर्विद्या, अस्त्र संचालन इत्यादि की शिक्षा दी जाती थी।चरित्र-निर्माण पर उस समय अधिक जोर दिया जाता था।

भारत में आर्य सभ्यता की देन – आर्यों ने उच्चकोटि की सभ्यता और संस्कृति का निर्माण किया, जो भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति की रीढ़ है। वैदिक सभ्यता ग्रामीण और कृषि प्रधान था। वैदिक ग्रंथों में जिन आदर्शों और सिद्धांतों का निरूपण किया गया है, वे भारतीय जीवन क पथ-प्रदर्शक हैं। संस्कृति की हजारों वर्षों की अविच्छिन्न परम्परा का बीजारोपण ऋग्वैदिक काल में ही हुआ। इस युग में ऋग्वैदिक काल में ही हुआ। उन्होंने वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक
और वेदांगों की रचना की। मानव इतिहास में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। . इस तरह आर्यों ने जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में प्रगति की। हिन्दू-धर्म के सभी आधारभूत ग्रंथों की रचना उसी काल में हुई। आज भी वे हमारे सर्वांगीण विकास के आधार हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि आधुनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वैदिक सभ्यता की अमिट छाप है।

मैक्समूलर ने ठीक ही कहा है -“वे दार्शनिक रचनाएँ विश्व साहित्य में अमर रहेंगी और मस्तिष्क की अंत्यन्त आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ कही जाएंगी।” आर्यों की मनुस्मृति आज भी हिन्दू कानून की आधारशिला है। वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, पारिवारिक परम्परा, विवाह पद्धति, अध्यात्मवाद, एकेश्वरवाद आदि आर्यों की महत्वपूर्ण देन हैं जो हमारे समाज में प्रचलित है। वास्तव में हम आर्य हैं और हमारी रग-रग में उसकी अमिट छाप है।


Q.9. उत्तरवैदिक काल के लोगों की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा आर्थिक स्थिति का वर्णन करें।

Ans ⇒ सामाजिक स्थिति-उत्तर वैदिक काल के लोगों के सामाजिक जीवन में स्थिरता आयी। उनका जीवन अपेक्षाकृत जटिल हो गया। इस काल में समाज में 4 वर्णों – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र का विकास हुआ। वर्गों का निर्धारण वंश के आधार पर होने लगा। प्रत्येक वर्गों के लिए अलग-अलग नियम बनाये गये। श्रम का विभाजन हो गया। जिसके कारण पेशेवर जातियाँ बनती गई। ब्राह्मणों का स्थान सर्वश्रेष्ठ हो गया। शूद्रों को हेय की दृष्टि से देखा जाने लगा। वैश्य तथा शूद्रों का शोषण होने लगा। केवल ब्राह्मण तथा क्षत्रिय को विशेषाधिकार दिये गये। जाति-प्रथा के बंधन कठोर होते गये। धीरे-धीरे कई जातियाँ बन गई। छुआछूत की प्रथा का विकास हुआ। दास वर्ग की उत्पत्ति हुई।

इस काल में वर्णाश्रम व्यवस्था की उत्पत्ति हुई। इसके अनुसार मनुष्य को 4 भागों में बाँट दिया गया। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम। मनुष्य के जीवन को 100 वर्षों का मानकर प्रथम 25 वर्ष ब्रह्मचर्य के रूप में बिताना था जिसमें मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन – विद्याध्ययन करता था। द्वितीय 25 वर्ष में लोग अपना घर बसाकर संतानोत्पत्ति, यज्ञ, दान आदि करता था। तीसरे 25 वर्ष में तपस्या में लीन रहता था तथा अंतिम के 25 वर्ष विरक्ति का जीवन
व्यतीत करता था।

उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की दशा में गिरावट आयी, बहुविवाह की प्रथा बढ गई। इस कारण उसका जीवन कलहपूर्ण हो गया। स्त्रियों के कई अधिकार छीन लिये गये। उन्हें केवल भोग-विलास की चीज समझी जाने लगी। पुत्री का जन्म अशुभ माना जाने लगा। कन्या क्रय-विक्रय भी होने लगा। वेश्यावृति का भी प्रचलन हुआ फिर भी उसकी स्थिति संतोष” का माता, बहन, पत्नी आदि के रूपों में स्त्रियों का परिवार में सम्मान था। नारी शिक्षा पर्ववत रही। नृत्य एवं संगीत में वे निपुण होती थी तथा वाद-विवादों और शस्त्रार्थों में भाग लिया करती थी।

इस काल में भी लोग पहले की तरह दूध, घी, फल, सब्जी, दाल आदि का प्रयोग थे। धनी लोग गेहूँ तथा गरीब लोग बाजरे की रोटी का प्रयोग करते थे। सोमरस का प्रयोग भी जाता था यद्यपि मदिरा पान अच्छा नहीं समझा जाता था फिर भी लोग इसका प्रयोग करते थे।
वेश-भूषा में उनका स्तर ऊँचा उठा। इस समय लोग रेशमी तथा केशर से रंगे वस्त्रों प्रयोग करने लगे। सिर पर पगड़ी पहनने की प्रथा शुरू हुई। स्त्रियाँ किनारेदार साड़ियाँ पहनने तथा नये-नये सुंदर और सुडौल आभूषणों का प्रयोग करने लगी। सौन्दर्य निखार के लिए ऑ” में काजल, विभिन्न तरह के सुगंधित तेलों का व्यवहार करने लगे। मनोरंजन के लिए नाटक का प्रचलन शुरू हुआ। इसके अलावे कुश्ती, तलवारबाजी, संगीत, नृत्य, चौपड़, धूत-क्रीड़ा का अधिक प्रचार हो गया था।

राजनीतिक स्थिति – उत्तर वैदिक काल में लोगों की राजनीतिक स्थिति में पहले से काफी परिवर्तन हुए। इस काल में बड़े एवं शक्तिशाली राज्यों की स्थापना हुई जिनमें प्रभुत्व हेतु आपसी संघर्ष शुरू हुए। यह प्राचीन भारत के साम्राज्यवाद का प्रथम युग था। वे अपना प्रभाव और कीर्ति बढ़ाने के लिए राजसूय तथा अश्वमेघ यज्ञ किया करते थे। इस युग में सामंतवादी प्रवृतियों का भी विकास होने लगा। एक तरफ राजतंत्र तो दूसरी तरफ प्रजातांत्रिक भावनाएँ विकसित हो रही थी।

इस काल में राजा की शक्ति में काफी वृद्धि हुई। वह राजा, सार्वभौम, सम्राट, अधिराज आदि उपाधियाँ ग्रहण करने लगा। वह अपनी इच्छानुसार शासन करता था लेकिन उसपर पुरोहित का नियंत्रण रहता था। यह धर्म के नियमों का पालन करता था। उसका प्रमुख कर्त्तव्य राज्य के नियमों तथा ब्राह्मणों की रक्षा करना था। धर्म विरुद्ध काम करने पर उसे गद्दी से उतार दिया जाता था। उस समय राजा न्यायकर्ता, सेनापति तथा प्रजापालक सभी कुछ होता था। शासन संबंधी मामलों में परामर्श हेतु पूर्व वैदिक काल की तरह सभा और समिति नामक दो संस्थाएँ थी, यद्यपि उसका महत्त्व कम गया था। इस प्रकार राजा निरंकुश नहीं होता था।
उस समय बड़े-बड़े राज्य स्थापित होने के कारण राजपदाधिकारियों की संख्या तथा अधिकारों में काफी वृद्धि हुई। शासन प्रणाली लगभग स्थिर हो गई थी। ऊँचे अधिकारियों की ‘रत्निन’ कहा जाता था इनमें प्रमुख थे-मंत्री (पुरोहित), संग्रहात्री (कोषाध्यक्ष), ग्रामिणी (न्यायालय का सभापति), सेनानी (सेनापति), सूत (सारथी) आदि। साधारण अधिकारियों में पालपति (सौ गाँवों का अफसर) स्थपति (सीमांत शासक) आदि थे। ‘उग्र’ एवं ‘जीवग्रह’ नामक पुलिस अधिकारी भी होते थे।
न्याय के क्षेत्र में राजा सर्वोच्च पदाधिकारी था। छोटे-छोटे मामलों की सुनवाई अधीनस्थ के अधिकारी करते थे। जटिल मामलों का निर्णय राजा करता था जो अंतिम एवं सर्वमान्य होता था। राजद्रोह के लिए प्राणदंड की व्यवस्था थी। ब्राह्मणों को प्राणदंड नहीं दिया जाता था।

धार्मिक स्थिति – उत्तर वैदिक काल में धर्म के मूल रूप में परिवर्तन आया। धार्मिक जीवन जटिल हो गया। इन्द्र तथा वरुण देवता का महत्त्व कम हो गया तथा विष्णु और रुद्र का महत्त्व बढ़ गया। धर्म का रूप याज्ञिक हो गया। यज्ञों की संख्या में वृद्धि हुई जिनमें राजसूय यज्ञ तथा अश्वमेघ यज्ञ प्रसिद्ध थे। यज्ञ इतने खर्चीले बना दिये गये कि वह साधारण व्यक्ति के सामथं स परे की चीज हो गई। ब्राह्मणों ने संसार से मुक्ति हेत यज्ञ आवश्यक करार दिया था। अतः यज्ञ सबों के लिए आवश्यक था।
धर्म के क्षेत्र में ब्राह्मणों का महत्त्व काफी बढ़ गया उन्हें भू-सूर, भू-दइव आदि नामा पुकारा जाने लगा। उनके बिना यज्ञ संभव नहीं था। यज्ञों में पशुबलि भी प्रारंभ हुआ। ऐसा समझ जाता था कि पशुबलि से पूर्वज तथा देवता दोनों खुश होते हैं। धर्म में बाह्याडम्बरों तथा अंधविश्वाश का प्रभाव बढ़ा। भूत-प्रेत, जादू-टोना आदि में लोग विश्वास करने लगे। ऐसा विश्वास किया जाने लगा कि यज्ञों तथा मंत्रों से न केवल देवताओं को वश में किया जा सकता है, बल्कि उन्हें समाप्त भी किया जा सकता है। तप का महत्त्व काफी बढ़ गया। तप को ब्रह्म स्वीकारा गया। ऐसा समझा जाता था कि तप के बिना ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता है।
इसी काल में लोगों ने अपनी समस्याओं के लिए गहन मनन करना शुरू किया। फलतः आरण्यकों, उपनिषदों, दर्शनशास्त्रों की रचना हई। पुनर्जन्म के सिद्धांत का अनुमोदन इसी काल में किया गया।

आर्थिक स्थिति – उत्तर वैदिक काल में आर्यों का आर्थिक संगठन और सुव्यवस्थित हुआ तथा आर्थिक जीवन अधिक समुन्नत हुआ। कृषि, व्यापार, उद्योग-धंधे आदि सभी क्षेत्रो में प्रगति हुई।
कषि में उस समय बडे-बडे हलों का प्रयोग किया जाने लगा। खाद, सिंचाई तथा फसल बोने में अदला-बदली द्वारा पैदावार बढ़ाने का प्रयास किया गया। तरह-तरह का दलहन, कपास तथा सिंचाई के प्रबंध से जमीन उपजाऊ हई तथा एक साल में तीन फसलें पैदाकर उत्पादन म वृद्धि की गई। कृषि के अतिरिक्त पशुपालन भी किया जाता था। किसानों के पास गाय, बैल, भेड़, बकरा आदि काफी संख्या में रहते थे। गाय को श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता था। पशुओं क लिए चारागाह होते थे। दूध, घी की कमी नहीं थी। लोग हाथी भी पालने लगे थे।
उस समय उद्योग – धंधों का भी काफी विकास हआ था। धात संबंधी ज्ञान की वृद्धि हुई। अतः नये-नये पेशों का उदय हुआ, जैसे-जौहरी, नट, गायक, वैद्य, ज्योतिषी, धोबी, सुनार, जुलाहे आदि। स्त्रियाँ चटाई, टोकरी आदि बनाने तथा कपडे सीने का काम करती थी। शीशे का प्रयोग बटखरे के रूप में होने लगा। चरखों तथा करघों का प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगा।
इस काल में वाणिज्य व्यापार में काफी वृद्धि हुई। व्यापारियों का अलग आनुवंशिक वर्ग बन गया जिन्हें ‘वणिज’ कहा जाता था। धनी व्यापारी ‘श्रेष्ठित’ कहलाते थे। ब्याज पर ऋण देने की प्रथा भली-भाँति शुरू हो गयी। जल तथा स्थल मार्गों से विदेशों से व्यापारिक संपर्क बढ़ा। वस्त्र, कम्बल, बकरी की खाल आदि मुख्य व्यापारिक वस्तुयें थी। निष्क, शतमान तथा कृष्णत नामक सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ। व्यावसायिक संघों की स्थापना हुई।


Q.10. वैदिक धर्म की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।

Ans ⇒ वैदिक साहित्य विशेषकर चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद जिस संस्कृत भाषा में लिखे (या रचे) गए थे वह वैदिक संस्कृति कहलाती है। यह संस्कृत उस संस्कृत से कुछ कठिन एवं भिन्न थी जिसका प्रयोग हम आजकल करते हैं। वस्तुतः वेदों को ईश्वरीय ज्ञान के तुल्य माना जाता था तथा यह शुरू में मौखिक रूप में ही ब्राह्मण परिवारों से जुड़े लोगों तथा कछ अन्य विशिष्ट परिवारजनों को ही पढ़ाया-सुनाया जाता था। महाकाव्य काल में रामायण तथा महाभारत की रचना के लिए जिन संस्कृत का प्रयोग किया गया वह वैदिक संस्कृत से अधिक सरल थी। इसलिए, वह संस्कृत और अधिक लोगों में लोकप्रिय हुई थी।
आर्यों ने सूर्य, अग्नि, वायु, जल आदि प्राकृतिक शक्तियों को अपने मन में उन्हें दैहिक (शरीर रूप में उच्च प्राणियों के रूप में माना। उनमें मानव एवं अच्छे (लाभदायक) अणओं के गण आरोपित किये। ऋग्वेद में सबसे प्रतापी देवता इन्द्र को माना गया। उसे वर्षा और युद्ध के देवताओं के रूप में माना जाता था। दूसरा देवता अग्नि को माना गया। अग्नि और मानव और देवताओं का माना गया। अग्नि में दी गई आहुतियाँ धुंआ बनकर आकाश में जाकर देवताओं तक पहुँच जाती हैं, ऐसी आर्यों की मान्यता थी। तीसरा देवता वरुण है, जो जल और समुद्र का देवता है। उसे प्राकतिक संतुलन के रूप में माना जाता है।
इसी प्रकार सोम, मारुन, अदिति, ऊषा आदि अन्य देवी-देवता हैं। देवियों की संख्या देवताओ से कम है। उपासना विधि है-स्तुति, पात, यथाहुति, समवेत स्वरों में गान आदि।


S.N Class 12th History Question 2022 
1. Class 12th History  ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART- 1
2. Class 12th History  ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART- 2
3. Class 12th History  ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART- 3
4. Class 12th History  ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART- 4
5. Class 12th History  ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART- 5
6. Class 12th History  ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART- 6
7. Class 12th History  ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART- 1
8. Class 12th History  ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART- 2
9. Class 12th History  ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART- 3
10. Class 12th History  ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART- 4
11. Class 12th History  ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART- 5
12. Class 12th History  ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART- 6

 

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