Class 12th Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर ) ( 15 Marks ) PART- 5


41. सेवा सेक्टर (तृतीयक व्यवसाय) क्या है ? (What is meant by service sector (tertiary occupation)?)

उत्तर-  तृतीयक व्यवसाय वह क्रियाकलाप है जो किसी मूर्तवस्तु का उत्पादन न कर केवल सेवा प्रदान करता है। इसमें मिस्त्री, प्लंबर, रसोइया, वकील, शिक्षक आदि के व्यवसाय सम्मिलित है। व्यापार, परिवहन, संचार और सेवाएँ कुछ अन्य तृतीयक कार्यकलाप हैं। वास्तव में, तृतीयक व्यवसाय सेवाएँ हैं, जिनके प्रमुख वर्ग निम्नलिखित हैं-

(i) वाणिज्यिक सेवाएँ विज्ञापन, कानूनी सेवाएँ, जन-संपर्क और परामर्श,
(ii) वित्त, बीमा, भूमि और भवन जैसी अचल संपत्ति का क्रय-विक्रय,
(iii) उत्पादक और उपभोक्ता को जोड़ने वाले थोक और फुटकर व्यापार, रख-रखाव, सौंदर्य प्रसाधक तथा मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएँ,
(iv) परिवहन और संचार-रेल, सड़क, जहाज, वायुयान, डाक-तार सेवाएँ
(v) मनोरंजन रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म और साहित्य,
(vi) विभिन्न स्तरीय प्रशासन-अधिकारी, पुलिस, सेना तथा अन्य जन-सेवाएँ और,
(vii) लाभ रहित सामाजिक कार्यकलाप-शिशु चिकित्सा, पर्यावरण, ग्रामीण विकास आदि से जुड़े संगठन।


42. चतुर्थक क्रिया-कलापों का विवरण दें। (Describe quarternary activities.)

उत्तर-  चतुर्थक क्रियाकलाप ज्ञान से संबंधित क्रियाकलापों जैसे शिक्षा, सचना, शोध और विकास की सेवा का एक विशिष्ट वर्ग है। चतुर्थक क्रिया कलाप से तात्पर्य उन उच्च बौद्धिक व्यवसायों से है, जिनका दायित्व चिंतन तथा शोध और विकास के लिए नये विचार देना है। इस वर्ग की विशिष्टता लोगों का उच्च वेतनमान और पदोन्नति के लिए उनका बहुत अधिक गतिशील होना है। चतुर्थक क्रियाकलापों में से कुछ निम्नलिखित है: सूचना का संग्रहण, उत्पादन और प्रकीर्णन अथवा सूचना का उत्पादन भी। चतुर्थक क्रिया-कलाप अनुसंधान और विकास पर केंद्रित होते हैं और विशिष्टीकृत ज्ञान, प्रौद्योगिकी कुशलता और प्रशासकीय सामर्थ्य से संबद्ध सेवाओं के उन्नत नमूने के रूप में देखे जाते हैं।
चतुर्थक क्रियाकलाप वास्तव में सेवाओं का विकसित और उन्नत रूप है। चतुर्थक क्रियाकलापों को बाह्य स्रोतन के माध्यम से भी किया जा सकता है।


43. किसी देश के आर्थिक विकास में सेवा सेक्टर किस प्रकार सहायक है ? (How is service sector helpful in economic development of a country?)

उत्तर-  आधुनिक आर्थिक विकास में सेवा सेक्टर बहुत सार्थक है और इसमें निरंतर वृद्धि हो रही है। सेवाओं के बढ़ते हुए महत्त्व ने इसे उत्पादक अर्थव्यवस्था में एक विशिष्ट स्थान दिला दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 75% और यू० के० में 80% कर्मी सेवा क्षेत्र में हैं, जबकि 1950 में यू० के० में केवल 51% और संयुक्त राज्य में लगभग 40% कर्मी इस सेक्टर में कार्यरत थे । अल्प विकसित देशों में 10% से भी कम लोग इस सेक्टर में हैं। वास्तव में, विकासशील देशों में भी सेवा क्षेत्र का विस्तार द्वितीयक क्षेत्र की तुलना में तेजी से हो रहा है, लेकिन असंगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले कर्मी की अधिकता के कारण इसका लेखा-जोखा करना कठिन कार्य है। संसार भर में सेवा क्षेत्र में रोजगार के अवसरों की वृद्धि के अनेक कारण हैं।


44. उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं? इन्होंने भारत के औद्योगिक विकास में किस प्रकार से सहायता की है? (What do you understand by liberalisation, privatisation and globalisation? How have they helped in the industrial development of India ?)

उत्तर-  1991 में भारत में अभूतपूर्व आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया था, विदेशी मुद्रा का भंडार समाप्त हो रहा था, नये ऋण नहीं मिल रहे थे और विदेशी निवेश वापस होने लगे थे। इन समस्याओं के समाधान के लिए जुलाई, 1991 में नई आर्थिक नीति लागू की गई, जिसके अन्तर्गत नई औद्योगिक नीति भी लागू हुई। इस नीति के तीन मुख्य लक्ष्य हैं उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (भू-मंडलीकरण)।

(i) उदारीकरण (Liberalisation) — उदारीकरण आर्थिक विकास की एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा उद्योगों और व्यापार को लालफीताशाही के अनावश्यक प्रतिबंध से मुक्त किया जाता है। इसके अन्तर्गत 6 उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया है। सार्वजनिक क्षेत्र में घाटे में चलने वाले कुछ उद्योगों को निजी क्षेत्र में दे दिया गया है तथा कुछ उद्योगों के शेयर वित्तीय संस्थाओं, सामान्य जनता और कामगारों को दिये गये, विदेशी पूंजी निवेश पर से प्रतिबंध हटाया गया, विदेशी तकनीक के प्रवेश का उदारीकरण हुआ और औद्योगिक स्थानीयकरण में भी उदारता प्रदान की गई। इससे उद्योगों को बड़ा लाभ हुआ।

(ii) निजीकरण (Privatisation)—निजीकरण का अर्थ है देश के अधिकतर उद्योगों के स्वामित्व, नियंत्रण तथा प्रबंध का निजी क्षेत्र में किया जाना। इस औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योगों की प्राथमिकता को खत्म कर दिया गया और निजी क्षेत्र को महत्त्वपूर्ण भूमिका सौंपी गई। सार्वजनिक क्षेत्र में मजबूरन कुछ अलाभकारी उद्योगों को लेना पड़ा।

(iii) वैश्वीकरण(Globalisation)—वैश्वीकरण का अर्थ मुक्त व्यापार तथा पूँजी और श्रम की मुक्त गतिशीलता द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को संसार की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना है। दूसरे शब्दों में, विदेशी पूँजी निवेश तथा विदेशी व्यापार को (आयात निर्यात के प्रति बंधों को यथासंभव समाप्त करके) प्रोत्साहित करना है। भारत में इस नीति के अंतर्गत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए अर्थव्यवस्था को खोला गया, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को खत्म किया गया तथा भारतीय कंपनियों को विदेशी कंपनियों के सहयोग से उद्योग खोलने की अनुमति प्रदान की गई। इससे उद्योगों का तो विकास हुआ, किन्तु विकसित और विकासशील राज्यों के बीच अंतर बहुत बढ़ गया है। उदाहरणस्वरूप 1991-2000 में कुल औद्योगिक निवेश का 23% औद्योगिक रूप से विकसित महाराष्ट्र के लिए, 17% गुजरात के लिए, 7% आंध्रप्रदेश के लिए और 6% तमिलनाडु के लिए था, जबकि सबसे अधिक जनसंख्या वाले उत्तरप्रदेश के लिए केवल 8% और सात उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए केवल 1% था। वास्तव में, आर्थिक रूप से कमजोर राज्य खुले बाजार में औद्योगिक निवेश को आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं।


45. प्रवास के सामाजिक जनांकिकीय परिणाम क्या-क्या हैं ?(What are the socio-demographic consequences of migration ?)

उत्तर-  प्रवास सामाजिक परिवर्तन में सहायक होता है। इससे विभिन्न संस्कृतियों के लोगों का अंतर्मिश्रण होता है, जिससे लोगों के मानसिक स्तर का विस्तार होता है तथा संकीर्ण विचारों का अन्त होता है। यह परिवर्तन विशेष रूप से नगरीय क्षेत्रों में होता है, जहाँ मिश्रित संस्कृति का विकास होता है। इतना ही नहीं, प्रवास के माध्यम से नवीन प्रौद्योगिकियों, परिवार नियोजन, बालिका शिक्षा इत्यादि से संबंधित नये विचारों का नगरीय क्षेत्रों से ग्रामीण क्षेत्रों की ओर विसरण होता है। किन्तु, ग्रामीण-नगरीय प्रवास के कारण व्यक्ति अपने परिवार से अलग हो जाता है और स्वतंत्र जीवन व्यतीत करने के क्रम में कभी-कभी गुमनामी, खिन्नता, अपराध और औषध दुरुपयोग (drugabuse) जैसी असामाजिक क्रियाओं में फँस जाता है। पुरुष बाह्य प्रवास के कारण स्त्रियाँ गाँवों में छूट जाती हैं, जिससे उनपर अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक दबाव पड़ता है। उच्च प्रशिक्षित लोगों के बाह्य प्रवास के कारण गाँव उनकी सेवाओं से बंचित रह जाता है।
मानव प्रवास उद्गम तथा गंतव्य दोनों स्थानों की जनांकिकी को भी प्रभावित करता है। यह जनसंख्या का पुनर्वितरण करता है। ग्रामीण नगरीय प्रवास नगरों में जनसंख्या की वृद्धि में योगदान देता है। यह दोनों क्षेत्रों की आयु एवं लिंग संरचना में गम्भीर असंतुलन पैदा कर देता है। नगरों में कार्यशील आयु के पुरुषों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे नगर का लिंग अनुपात काफी कम हो जाता है। इसके विपरीत गाँवों में लिंग अनुपात बढ़ जाता है तथा यहाँ आश्रित जनसंख्या (Dependant population) की अधिकता हो जाती है।


46. भारत के 15 प्रमुख राज्यों में मानव विकास के स्तरों में किन कारणों ने भिन्नता उत्पन्न की है ? (Which factors have caused spatial variation in the level of human development among 15 major states of India ?)

उत्तर-  मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से विश्व के 172 देशों में भारत का स्थान 127 है और इसे मध्यम मानव विकास दर्शाने वाले देशों में रखा गया है। भारत के विभिन्न राज्यों में भी मानव विकास के स्तरों में भिन्नता पायी जाती है। भारत के योजना आयोग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मानव विकास सूचकांक का परिकलन किया है। इसके अनुसार 0.638 संयुक्त सूचकांक मूल्य के साथ केरल कोटिक्रम में सर्वोच्च है। इसके बाद क्रमशः पंजाब, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और हरियाणा (सभी 0.5 से अधिक) आते हैं। दूसरी ओर, देश के 15 प्रमुख राज्यों में बिहार (0.367) का स्थान सबसे नीचे है। बिहार के अतिरिक्त, असम, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और उड़ीसा (0.386 से 0.404) भी कोटिक्रम में नीचे हैं।
भारत में मानव विकास के स्तरों में प्रादेशिक भिन्नता के कई कारण हैं, जिनमें साक्षरता, आर्थिक विकास और उपनिवेशकाल में विकसित प्रादेशिक विकृतियाँ और सामाजिक विषमताएं मुख्य हैं। केरल भारत का सबसे अधिक साक्षर (90.92%) राज्य हैं। इसी प्रकार पंजाब (69.68%), तमिलनाडु (73.47%), महाराष्ट्र (77.27%) और हरियाणा (68.59%) भी अधिक साक्षर राज्य हैं। साक्षरता के उच्च स्तर मानव विकास सूचकांक के उच्च स्तर के कारण हैं। दूसरी ओर, बिहार में कुल साक्षरता दर भारत के सभी राज्यों से निम्न (47.53%) है और यह मानव विकास में भी निम्नतम स्तर पर है। मानव विकास के निम्न स्तर वाले अन्य राज्य असम (64.28%), उत्तरप्रदेश (57.36%), मध्यप्रदेश (64.11%) और उड़ीसा (63.61%) में भी साक्षरता का स्तर निम्न है। इन निम्न स्तर वाले राज्यों में पुरुष और स्त्री साक्षरता के बीच अधिक अंतर है। इसी प्रकार, आर्थिक दृष्टि से विकसित महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में मानव विकास सूचकांक का मूल्य असम, बिहार, मध्यप्रदेश जैसे पिछड़े राज्यों की तुलना में ऊँचा है। उपनिवेश काल में विकसित प्रादेशिक विकृतियाँ और सामाजिक विषमताएँ अब भी भारत की अर्थव्यवस्था और समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।


47. ऊर्जा के अपारंपरिक या गैर-परंपरागत स्त्रोत कौन-से हैं? भारत में इसकी संभावनाओं की चर्चा करें। (What are unconventional sources of energy? Discuss its prospects in India.)

उत्तर-  स्रोत- ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोत सूर्य, पवन, ज्वार और लहरें, भू-ताप और जैविक उत्पाद हैं । इनसे प्राप्त ऊर्जा को क्रमशः सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय और तरंग ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा और जैव-ऊर्जा कहते हैं। ये सभी ऊर्जा के सतत पोषणीय स्रोत हैं, ये कभी खत्म नहीं हो सकते और इनका नवीकरण होता रहता है। ये ऊर्जा स्रोत समान रूप से वितरित तथा पर्यावरण अनुकूल है। इन स्रोतों का आरंभिक लागत अधिक होता है, किंतु इसके बावजूद ये अधिक टिकाऊ, पारिस्थितिक अनुकूल तथा सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं।
भारत में ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोत विपुल हैं और इनका भविष्य उज्ज्वल है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार भारत में ऊर्जा के इन स्रोतों की अनुमानित उत्पादन क्षमता 93000 मेगावॉट है। इनमें से कुछ का ही भारत में उपयोग होता है।

संभावना :

सौर ऊर्जा – ऊष्ण कटिबंध में स्थित होने के कारण भारत में सौर ऊर्जा की उत्पादन क्षमता और उपयोगिता की अधिक संभावना है। यहाँ प्रति वर्ग किमी० क्षेत्र में 20 मेगावाट प्रतिवर्ष सौर ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। देश के विभिन्न भागों में सौर ऊर्जा बहुत लोकप्रिय हो रही है। इसका उपयोग खाना बनाने, पम्प द्वारा जल निकालने, पानी को गर्म करने तथा रोशनी के लिए किया जा रहा है। भारत में सबसे बड़ा सौर संयंत्र भुज (गुजरात) में लगाया गया है। राजस्थान
के थार मरुस्थल में इसके विकास की अधिक संभावनाएँ हैं।

पवन ऊर्जा – भारत में लगभग 23000 मेगावॉट पवन ऊर्जा की उत्पादन क्षमता है । देश में लगभग 90 स्थानों की पहचान पवन ऊर्जा केन्द्र के रूप में की गई है। ये स्थान गुजरात, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और लक्षद्वीप में स्थित हैं। गुजरात के कच्छ में लाम्बा का पवन ऊर्जा एशिया का

ज्वारीय ऊर्जा- भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर इसके विकास की संभावनाएं हैं। कच्छ और खंभात की खाड़ियों में, जहाँ ऊँचे ज्वार उठते हैं, ज्वारीय ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है।

भूतापीय ऊर्जा- भारत में गर्म जल के अनेक झरने हैं, जिससे विद्युत उत्पन्न कर फ्रीज आदि चलाए जा सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में मणिकर्ण गर्म झरना से यह भूतापीय ऊर्जा उत्पन्न करने का प्रयास चल रहा है।

जैव-ऊर्जा- गन्ना की खोई, धान की भूसी, खेती के कुड़े-कचरे, झाड़-झंखाड़, मानव और पशु मल-मूत्र से बायोगैस पैदा की जा सकती है। भारत के बहुत सारे गाँवों में बायोगैस का उत्पादन किया जा रहा है।


48. भारत में भू-संसाधनों की विभिन्न प्रकार की पर्यावरणीय समस्याएँ कौन-सी हैं ? उनका निदान कैसे किया जाए? (What are the various environmental problems of land resources in India? What is the solution ?)

उत्तर-  भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए भू-संसाधन की महत्ता अधिक है, किन्तु देश के भू-संसाधन अनेक पर्यावरणीय समस्याओं से भरे हैं, जिनमें कृषि भूमि की गुणवत्ता का निम्नीकरण, प्राकृतिक आपदा, मिट्टी अपरदन, जल जमाव, लवणीकरण इत्यादि मुख्य हैं। इन समस्याओं का समाधान करके कृषि का विकास किया जा सकता है।

(i) कृषियोग्य भूमि का निम्नीकरण (Degradation)- जनसंख्या की अधिकता के कारण भारतीय कृषि भूमि का लगातार उपयोग हो रहा है, जिससे इसकी गुणवत्ता का ह्रास हुआ है और उर्वरता कम हो गई है। इसका समाधान फसल बदलकर और कुछ समय के लिए खेत को परती छोड़कर किया जा सकता है।

(ii) प्राकृतिक आपदा (Natural Calamity) – भारतीय कृषि क्षेत्र का एक तिहाई भाग ही सिंचित है। इतने बड़े देश में एक ओर कुछ क्षेत्र वर्षाऋतु में बाढ़ से प्रभावित रहते हैं, तो दूसरे क्षेत्र सूखा ग्रस्त। सूखा और बाढ़ भारतीय कृषि के जुड़वा संकट हैं। उचित जल प्रबंधन द्वारा नहरों और नलकूपों का निर्माण करके इस समस्या का समाधान हो सकता है।

(iii) मिट्टी अपरदन (Soil Erosion) – भारत में बड़े पैमाने पर मैदानी भागों में सतही अपरदन और पर्वतीय और पठारी भागों में अवनालिका अपरदन से मिट्टी का ऊपरी उपजाऊ तत्त्व बहकर अन्यत्र चला जाता है और पथरीली अनुपजाऊ भूमि सतह पर आ जाती है। खेतों के किनारे मेढ़ बनाना और वृक्षारोपण तथा पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा खेती करके इसका समाधान हो सकता है।

(iv) जल-जमाव (Water logging) — निकास(outlet) के अभाव में कृषि भूमि का एक बहुत बड़ा भाग जल-जमाव, वाष्पीकरण, लवणता और मृदा क्षारता के कारण बंजर हो चुका है। जल-निकास का प्रबंध करके इसका समाधान किया जा सकता है।

(v) कीटनाशक रसायनों का अत्यधिक प्रयोग (Over-use of pesticides)—इससे मृदा परिच्छेदिका में जहरीले तत्त्वों का सांद्रण हो गया है और भूमि में पुनः उर्वरकता पाने की प्राकृतिक प्रक्रिया अवरुद्ध हो गई है। जैविक खाद का प्रयोग इसका समाधान है। कृषि तथा बंजर भूमि की अधिकता, भूमि पर आधिपत्य में असमानता, छोटे खेत और विखंडित जोत, वित्तीय संस्थाओं की बाध्यताएँ एवं ऋणग्रस्तता, वाणिज्यीकरण का अभाव और अधिसंरचना की कमी अन्य समस्याएँ हैं।


49. भारत में जलविद्युत-शक्ति के विकास की आवश्यक दशाओं का वर्णन करें। (Describe the conditions suitable for the development of water power/hydel power in India.)

उत्तर-  जलविद्युत-उत्पादन के लिए कुछ विशेष भौगोलिक दशाओं का होना आवश्यक है। भारत में इसके लिए भौतिक और आर्थिक दोनों ही दशाएँ अनुकूल हैं। ये आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्नलिखित हैं –

(i) पर्याप्त जल मिलना- भारत के उत्तरी-पूर्वी राज्यों, हिमालय के पर्वतीय भाग तथा पश्चिमी घाट पर्वत में पर्याप्त वर्षा होती है और नदियों में सालों भर पानी भरा रहता है। हिमालय से निकलनेवाली नदियाँ बड़ी-बड़ी हैं, जिन्हें सहायक नदियों से भी जल मिलता है।

(ii) जल का निरंतर प्रवाहित होते रहना- जल के निरंतर प्रवाहित होने से पनबिजली का उत्पादन सालों भर होता है। भारत में हिमालय से निकलनेवाली नदियाँ सदा प्रवाही हैं, क्योंकि इन्हें गर्मी में बर्फ के पिघलने से जल मिलता है। यह सुविधा दक्षिण की पठारी नदियों में नहीं है, फिर भी वहाँ बाँध और विशाल जलाशय बनाकर उनमें वर्षाकालीन जल एकत्रित कर जलाभाव की पूर्ति की जा सकती है।

(iii) जल का तीव्र वेग से गिरना- भारत में जल-वेग के लिए आदर्श स्थिति मिलती है। देश के पर्वतीय और पठारी भागों में जल तीव्र गति से बहता है और अनेक जलप्रपात पाये जाते हैं। इससे जल-विद्युत का उत्पादन सरल हो जाता है। इसके अतिरिक्त बहुउद्देशीय योजनाओं के
अंतर्गत कृत्रिम बाँध बनाकर भी जल को तीव्र गति से गिराया जाता है।

(iv) विद्युत की माँग का व्यापक क्षेत्र- भारत में जल-विद्युत् का बाजार काफी विस्तृत है। यह एक विकासशील देश है, जहाँ घरेलू उपयोग के अतिरिक्त कृषि-मशीन, औद्योगिक मशीन, रेलगाड़ी इत्यादि में जलविद्युत की माँग दिनों दिन बढ़ती जा रही है।

(v) शक्ति के अन्य साधनों का अभाव- भारत में कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि शक्ति के साधन सीमित क्षेत्रों में उपलब्ध हैं। उत्तर-पश्चिमी और दक्षिणी भारत में आर्थिक विकास के लिए जलविद्युत का विकास लाभप्रद होगा।

(vi) तकनीक एवं पँजी- भारत में जलविद्युत के विकास के लिए उपर्युक्त तकनीक और पर्याप्त पूँजी भी उपलब्ध हैं।


50. भू-निम्नीकरण को कम करने के उपाय सुझाइये। (Suggest measures to reduce land degradation.) अथवा, भूमि / मृदा प्रदूषण को कम करने के उपाय बताइये। (Suggest measures to reduce soil pollution.)

उत्तर-  भू-निम्नीकरण का अभिप्राय स्थायी या अस्थायी तौर पर भूमि की गुणवत्ता तथा उत्पादकता में कमी है। इसे “भूमि विकृति” भी कहते हैं। भू-निम्नीकरण दो प्रक्रियाओं द्वारा होता है—प्राकृतिक एवं मानव जनित। प्राकृतिक कारकों द्वारा विकृत भूमि प्राकृतिक खड्ड, रेतीली भूमि, बंजर चट्टानी क्षेत्र, तीव्र ढाल वाली और हिमानीकृत भूमि है। प्राकृतिक और मानवीय कारकों द्वारा विकृत भूमि में जल-जमाव और दलदलीय क्षेत्र, लवणता और क्षारता से प्रभावित तथा झाड़ियों सहित या रहित भूमि शामिल है। भारत में सकल कृषि रहित भूमि 17.98% है, जिनमें 2.18% बंजर और कृषि अयोग्य बंजर तथा 15.8 % निम्नीकृत है। निम्नीकृत भूमि प्रकृति जनित 2.4%, प्रकृति एवं मानव जनित 7.5% और मानव जनित 5.88% है।

भू-निम्नीकरण को कई उपायों से कम किया जा सकता है-

(i) जल संभरण प्रबंधन – यह कार्यक्रम भमि, जल तथा वनस्पतियों के बीच संबद्धता को पहचानकर प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन एवं सामुदायिक सहभागिता से लोगों की आजीविका को सुधारता है। यह निम्नीकरण को रोकने तथा भूमि की गुणवत्ता को सुधारने में सफल सिद्ध होगा। इस कार्यक्रम ने अकेले झबुआ जिले (मध्य प्रदेश) की लगभग 20% भूमि का उपचार किया है और उन्हें दलदल, जल-जमाव, लवणता और क्षारता से छुटकारा दिलाया है। .

(ii) चारागाह प्रबंधन एवं वन रोपण- चारागाह भूमि और अन्य व्यर्थ भूमि पर चारा लगाकर भूमि का उपयोग बढ़ाया जा सकता है। पर्वतीय ढालों पर वनरोपण द्वारा भूमि अपरदन को कम किया जा सकता है।

(iii) जैविक खाद का प्रयोग- किसानों को जैविक खाद के महत्त्व तथा रासायनिक पदार्थों के उचित उपयोग के बारे में प्रशिक्षण देना चाहिए। सड़ी-गली सब्जियों और फलों तथा पशुओं क मल-मूत्र को उचित प्रोद्योगिकी द्वारा बहुमूल्य खाद में परिवर्तन किया जा सकता है।

(iv) गंदे पानी का उपचार और उपयोग– नगरीय तथा औद्योगिक गंदे पानी को साफ करके सिंचाई के लिए प्रयोग करना चाहिए।

(v) नगरों के ठोस एवं तरल अपशिष्ट का प्रबंधन- गंदी बस्तियों के लोगों को सुलभ शौचालय की सुविधा देकर भूमि प्रदूषण को कम किया जा सकता है। प्लास्टिक के बने पदार्थों को जल के प्रवाह में नहीं जाने दिया जाए। इससे जल और भूमि दोनों का प्रदूषण कम होगा।


51. भारत में गंदी बस्तियों की समस्याओं का वर्णन कीजिए। (Dėscribe the problemis of slums in India.)

उत्तर-  साधारणतया नगरीय जीवन को सुख और सुविधा संपन्न तथा रोजगार के अवसर के उपयुक्त माना जाता है। इसके विपरीत गाँवों में सुविधाओं और रोजगार के अवसर की कमी रहती है। इस कारण अधिकाधिक संख्या में लोगों का गाँवों से नगरों की ओर प्रवास होता है। अत्यधिक और अनियंत्रित ग्रामीण-नगरीय प्रवास के कारण नगरीय सेवाओं और सुविधाओं पर अत्यधिक बोझ पड़ता है, जिसके कारण नगर के भीतरी भाग में भूमि की कीमत बढ़ जाती है और गाँवों से आये हुए या कम आय वाले लोग जहाँ-तहाँ झुग्गी-झोपड़ियों और गंदी-बस्तियों का निर्माण करते हैं। ये गंदी या मलीन बस्तियाँ समस्याओं के महाजाल में फंसी रहती हैं।
भारत के जनगणना विभाग के अनुसार भारत के 607 नगरों में झुग्गी-झोपड़ियाँ हैं, जिनमें 4 करोड़ लोग या कुल नगरीय जनसंख्या का 23.6% रहती है। यह देश की कुल जनसंख्या का 4% है। महाराष्ट्र की 6% और मुम्बई की 49% जनसंख्या झुग्गियों में रहती है, जहाँ धारावी एशिया की विशालतम गंदी बस्ती है।
गंदी बस्तियों के अन्तर्गत झुग्गी और झोपड़पट्टी के अतिरिक्त नगर के पुराने घने आबाद क्षेत्र तथा अनियोजित नये बसे क्षेत्र आते हैं। भारत की गंदी बस्तियाँ न्यूनतम वांछित आवासीय क्षेत्र होते हैं, जहाँ जीर्ण-शीर्ण मकान, स्वास्थ्य की निम्नतम सुविधाएँ, खुली हवा, पेयजल, प्रकाश तथा शौच सुविधाओं जैसी आधारभूत सुविधाओं का अभाव पाया जाता है। यह क्षेत्र बहुत ही भीड़-भाड़, पतली सकरी गलियों और खुले नालों वाला होता है। यहाँ के लोग कम वेतन वाले असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, अत: ये अल्प पोषित होते हैं और बीमारियों से ग्रस्त रहते हैं। ये अपने बच्चों के लिए उचित शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते। गरीबी के कारण ये नशीली दवाओं, शराब, अपराध, गुंडागर्दी, कुरीति आदि का शिकार हो जाते हैं।


52. भारत के आर्थिक विकास में सड़कों की भूमिका का वर्णन करें। (Discuss the role of roads in the economic development of India.)

उत्तर-  भारत के आर्थिक विकास में सड़कों का बड़ा योगदान है। भारत का सड़क जाल विश्व के विशालतम सड़क जालों में से एक है। इसकी कुल लम्बाई 33.1 लाख किमी० है। प्रतिवर्ष लगभग 85% यात्री तथा 70% माल सडकों द्वारा ही एक स्थान से दसरे स्थान पर पहुंचाये जाते हैं। छोटी दूरियों की यात्रा के लिए सड़क परिवहन अपेक्षाकृत अनुकूल होता है। भारत में गाँव बड़े और छोटे नगरों से सड़क द्वारा जुड़ गए हैं तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार आ गया है। सीमांत सड़कें सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाती हैं। सड़कें विभिन्न क्षेत्रों के बीच सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संपों को बढ़ाती है। प्राकृतिक आपदा के समय रेलवे की तुलना में सड़क मार्ग से पहुँचना सरल है। कारें और आरामदेह बसें पर्यटन को सुविधाजनक बनाती है। नष्ट होने वाली वस्तुओं जैसे- दूध, फल, सब्जियों इत्यादि का शीघ्र परिवहन सड़क द्वारा संभव है। बस, ट्रक तथा कार कहीं भी रुक कर सवारी और सामान उतार-चढ़ा सकती है। इसने पहाड़ी, ऊबड़-खाबड़, मरुस्थली, दलदल इत्यादि सब तरह के धरातलों को जोड़ दिया है।


53. भारत में जलप्रदूषण के कारणों और परिणामों का वर्णन करें। (Describe the causes and consequences of water pollution in India.) अथवा, भारत की गंगा और यमुना दो सर्वाधिक प्रदूषित नदियाँ हैं। कैसे? इस कथन का परीक्षण करें। Or, (Ganga and Yamuna are the two highly polluted rivers of India. How ? Examine this statement.)

उत्तर-  प्राकृतिक या मानवीय क्रियाओं के फलस्वरूप अल को गुणवत्ता में हुए निम्नीकरण को जल-प्रदूषण कहा जाता है, जो आहार, मानव तथा अन्य जाडो के स्वास्थ्य, कृषि, मछली पालन या मनोरंजन के लिए अनुपयुक्त या खतरनाक होते हैं। भारत में जनसंख्या की वृद्धि तथा औद्योगिक विस्तार के कारण जल के अविवेकपूर्ण उपयोग से नदियों, नहरों, झीलों तथा तालाबों में जल की गुणवत्ता में बहुत अधिक निम्नीकरण हुआ है। इनमें निलंबित कण, कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ अधिक मात्रा में समाहित हो गये हैं, जल में स्वतः शुद्धिकरण की क्षमता नहीं रह गयी है और यह उपयोग के योग्य नहीं रह गया है। जल प्रदूषण प्राकृतिक (अपरदन, भूस्खलन, पेड़-पौधे और मृत पशु के सड़ने-गलने) और मानवीय (कृषि, उद्योग और सांस्कृतिक गतिविधि) स्रोतों से होता है। इनमें उद्योग सबसे बड़ा प्रदूषक है।
उद्योगों के अवांछनीय उत्पाद जैसे औद्योगिक कचरा, प्रदूषित अपशिष्ट जल, जहरीली गैसें, रासायनिक अवशेष इत्यादि बहते जल या झीलों में बहा दिये जाते हैं, जिससे जल प्रदूषित हो जाता है। चमड़ा उद्योग, कागज और लुग्दी उद्योग, वस्त्र तथा रसायन उद्योग सर्वाधिक जल-प्रदूषक हैं। कानपुर और मोकामा का चमड़ा उद्योग गंगा को और दिल्ली का विविध औद्योगिक कचरा यमुना को प्रदूषित कर रहा है। इसी प्रकार कृषि में अकार्बनिक उर्वरक, कीटनाशक इत्यादि के उपयोग से भी जल-प्रदूषण होता है । ये प्रदूषक जल के साथ भू-जल तक पहुँच जाते हैं और धरातलीय जल के साथ-साथ भूमिगत जल को भी प्रदूषित कर देते हैं। घरेलू कचरा और अपशिष्ट तथा नदी में लाशों के विसर्जन से भी जल-प्रदूषण होता है। कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना तथा कोलकाता के घरेलू कचरे गंगा और हुगली को तथा दिल्ली का घरेलू कचरा यमुना को प्रदूषित कर रहे हैं। दिल्ली के निकट यमुना में 17 खुले नाले मल-जल डालते हैं। इसके अतिरिक्त तीर्थ यात्राओं, धार्मिक मेलों, पर्यटन इत्यादि सांस्कृतिक गतिविधियों के कारण भी जल प्रदूषित होता है ।
जल प्रदूषण से विभिन्न प्रकार की जल-जनित बीमारियाँ, जैसे दस्त, आँतों की कृमि, हेपेटाइटिस इत्यादि होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग एक-चौथाई संचारी बीमारी जल-जनित होती है।


S.N Geography लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर ( 20 Marks )
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S.NGeography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर ) ( 15 Marks )
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