Class 12th Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर ) ( 15 Marks ) PART- 4

 


31. गहन निर्वाह कृषि की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।(Describe the characteristics of intensive subsistence agriculture.)

उत्तर- यह कृषि पद्धति संसार के घने बसे क्षेत्रों में प्रचलित है। यहाँ भूमि पर जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है, अतः प्रति व्यक्ति कृषि भूमि की उपलब्धता निम्न है। खेतं बिखरे और छोटे होते हैं, किसान साधारण तथा निर्धन होते हैं, पुराने औजार और मानव तथा पशु श्रम का अधिक प्रयोग होता है, नये मशीनों का प्रयोग कम होता है तथा पूंजी निवेश भी कम होता है। रासायनिक खादों और सिंचाई के साधनों का इस्तेमाल कम होता है। मानसूनी वर्षा पर निर्भरता अधिक रहती है। इसके बावजूद इस क्षेत्र में प्रति हेक्टर उत्पादन अधिक होता है। इसका कारण यह है कि यह खेती एक जीवन शैली बन गई है। खेत किसानों का एक प्रकार का बगीचा होता है, जिसमें दिन-रात परिश्रम करके अधिकाधिक उत्पादन करते हैं और एक-एक इंच भूमि पर फसल उपजाते हैं। यहाँ वर्ष में दो-तीन फसलें और एक फसल मौसम में कई फसलें उपजायी जाती हैं। फसलों में खाद्यान्न की प्रधानता रहती है; अन्य फसलें आवश्यकतानुसार उपजाई जाती हैं।
गहन निर्वाहन कृषि मानसून जलवायु वाले दक्षिणी एवं दक्षिणी पूर्वी एशिया में प्रचलित है। इस क्षेत्र में अत्यधिक घनी जनसंख्या के कारण उत्पादन निर्वाहस्तर पर ही रहता है और बिक्री के लिए अवशेष बहुत कम बचता है। इसी कारण इसे निर्वाहन कृषि कहा जाता है।
जलवायु में प्रादेशिक भिन्नता के कारण गहन निर्वाहन कृषि मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं – (i) चावल प्रधान गहन निर्वाहन कृषि, (ii) चावल विहीन गहन निर्वाहन कृषि।


32. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में हुए कृषि विकास की व्याख्या करें। (Discuss the development of agriculture in India after independence.)

उत्तर-  कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है, जो देश के 57% भू-भाग पर की जाती है और जिस पर देश की 53% जनसंख्या आश्रित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने कृषि में पर्याप्त प्रगति की है। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक इसकी दशा दयनीय थी। अकाल, सूखा और देश विभाजन के बाद एक तिहाई सिंचित क्षेत्र का पाकिस्तान में चला जाना ऐसी समस्याएँ थीं, जिससे निपटने के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाना आवश्यक हो गया। इसके लिए कृषि विकास की रणनीति के अंतर्गत कई उपाय अपनाए गए, जिनमें (i) व्यापारिक फसलों की जगह खाद्यान्नों का उपजाना, (ii) कृषि गहनता को बढ़ाना तथा (iii) कृषि योग्य बंजर तथा परती भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित करना शामिल है। प्रारंभ में इस नीति से खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ा, किन्तु बाद में यह स्थिर हो गया। इस समस्या से उभारने के लिए 1961 में गहन कृषि जिला कार्यक्रम (IADP) और गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP) प्रारंभ किये गये। लेकिन 1960 के दशक के अकाल और खाद्यान्न के आयात की बाध्यता ने सरकार को विभिन्न कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने पर बाध्य कर दिया। सरकार ने अधिक उपज देने वाले गेहूँ के बीज मेक्सिको से तथा चावल के बीज फिलिपींस से आयात किए। इसके अतिरिक्त सिंचित क्षेत्र का विस्तार किया गया, रासायनिक खाद, कीटनाशक और कृषि यंत्र के प्रयोग पर जोर दिया गया। इन प्रयासों के फलस्वरूप खाद्यान्नों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई और इसे “हरितक्रान्ति” के नाम से जाना गया। देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया। किन्तु हरित क्रांति का लाभ पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश और गुजरात के सिंचित क्षेत्र तक ही सीमित रहा और देश में कृषि विकास में प्रादेशिक असमानता बढ़ गई। 1980 ई० के बाद यह प्रौद्योगिकी देश के मध्य
और पूर्वी भाग में पहुँची। 1980 के दशक में योजना आयोग ने वर्षा आधारित क्षेत्र की कृषि पर ध्यान दिया और 1988 में कृषि विकास में प्रादेशिक संतुलन लाने के लिए कृषि, पशुपालन तथा जलकृषि के विकास के लिए संसाधनों के विकास पर बल दिया। 1990 के दशक की उदारीकरण नीति तथा उन्मक्त बाजार अर्थव्यवस्था ने भी भारतीय कृषि विकास को प्रभावित किया है।


33. भारत में धान के उत्पादन एवं वितरण की विवेचना करें। (Discuss the production and distribution of paddy in India.)

उत्तर-  भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा बड़ा धान-उत्पादक देश है। धान की खेती भारत की कुल कृषि-भूमि के एक-चौथाई भाग में की जाती है। यह देश के तीन-चौथाई लोगों का प्रमुख खाद्यान्न है।
धान उष्ण एवं आर्द्र जलवायु की फसल है। इसे बोते समय 20° से०ग्रेड तथा पकते समय 27° सेग्रेड तापमान आवश्यक है। धान के खेत में कई महीनों तक पानी भरा रहना आवश्यक है। इसकी खेती के लिए 75 से 200 सेमी० वर्षा आदर्श है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता रहती है। धान की खेती के लिए केवाल या चिकनी मिट्टी उपयुक्त होती है। पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर धान की खेती होती है। धान की रोपनी, कटाई और चावल की तैयारी में अधिक मानव-श्रम की आवश्यकता है। जहाँ ये दशाएँ उपलब्ध हैं, वहाँ चावल की गहन कृषि की जाती है।
धान की खेती भारत में प्रायः सभी भागों में की जाती है। परन्तु, इसका प्रधान उत्पादक क्षेत्र देश का पूर्वी भाग है। गंगा का मध्यवर्ती या निचला मैदान, असम घाटी तथा पूर्वी तटीय प्रदेश और डेल्टा में धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। देश का 90% चावल प० बंगाल, आंध्रप्रदेश, बिहार, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उड़ीसा, असम, केरल, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से प्राप्त होता है। इन सभी क्षेत्रों में चावल-उत्पादन की उपयुक्त भौगोलिक दशाएँ पायी जाती हैं।


34. भारत में गेहूँ के उत्पादन क्षेत्र (वितरण) का वर्णन कीजिए। (Describe the distribution of wheat in India.)

उत्तर-  भारत में गेहूँ की खेती मुख्यतः सतलज के मैदान, ऊपरी और मध्य गंगा के मैदान तथा मध्यवर्ती भारत में होती है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य निम्नलिखित हैं-

1. उत्तर प्रदेश– इस राज्य में कुल कृषि भूमि के 23% क्षेत्र पर गेहूँ बोया जाता है। यह प्रदेश देश का 30% गेहूँ उत्पादित करता है। गंगा-यमुना दोआब तथा गंगा-घाघरा क्षेत्र गेहूँ की ऊपज के लिए प्रसिद्ध है। वैसे पठारी भागों को छोड़कर समस्त भू-भाग में गेहूँ की खेती की जाती है। मेरठ, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, इटावा, कानपुर, आगरा, अलीगढ़ प्रमुख उत्पादक जिले हैं।

2. पंजाब- इस राज्य में कुल कृषि भूमि के 12.5% भाग पर गेहूँ की खेती की जाती है। यह कुल राष्ट्रीय उत्पादन का 24% गेहूँ उत्पन्न करता है। यहाँ नहरों द्वारा सिंचाई की सुविधा है। अमृतसर, लुधियाना, पटियाला, जालंधर, फिरोजपुर इत्यादि मुख्य उत्पादक जिले हैं।

3. हरियाणा-  इस राज्य की कुल कृषि भूमि के 6.17% भाग पर गेहूँ की खेती की जाती है। मुख्य उत्पादक जिले रोहतक, हिसार, गुड़गाँव, करनाल व जिन्द हैं। दक्षिणी-पूर्वी जिलों की जलवायु शुष्क है, लेकिन नहरों के विकास के कारण गेहूँ का उत्पादन बढ़ गया है।

4. मध्यप्रदेश– राज्य की कृषि भूमि के 17.7% क्षेत्र पर गेहूँ उगाया जाता है तथा यह पूरे देश का 12% गेहूँ प्रदान करता है। देश में इसका चौथा स्थान है। होशंगाबाद, सागर, ग्वालियर, नीमाढ़, उज्जैन, देवास, भोपाल और जबलपुर मुख्य उत्पादक जिले हैं।
उपर्युक्त राज्यों के अलावा पूर्वी राजस्थान व बिहार में गेहूँ का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। दक्षिण भारत में महाराष्ट्र व गुजरात के लावा मिट्टी प्रदेश व तमिलनाडु के मदुराई क्षेत्र में गेहूँ का उत्पादन उल्लेखनीय है।


35. भारत में गेहूँ की खेती के लिए उपयुक्त भौगोलिक दशाओं का वर्णन कीजिए। (Describe the suitable geographical conditions for the production of wheat in India.)

उत्तर-  गेहूँ उत्पादन की उपयुक्त भौगोलिक दशाएँ-गेहूँ शीतोष्ण कटिबंधीय फसल है। अतः इसकी खेती मुख्यतः कर्करेखा के उत्तर पश्चिमोत्तर भारत में होती है। गेहूँ को बोते समय 10° से 15° सेग्रेड तथा पकते समय 20° से 30° से०ग्रेड तापमान उपयुक्त होता है। इसके लिए 50 से 75 सेमी० वर्षा उपयुक्त होती है। वर्षा के अभाव में सिंचाई का समुचित प्रबंध अनिवार्य हो जाता है। फसल पकते समय तेज धूप एवं शुष्क ताप आवश्यक है। गेहूँ की खेती किसी भी मिट्टी में हो सकती है, किन्तु हल्की दोमट मिट्टी तथा काली मिट्टी गेहूँ के लिए उपयुक्त मानी जाती है। गेहूँ की खेती में भी कुशल श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है, किन्तु अब पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में ट्रैक्टर से जुताई तथा भेंसर से दमाही होने लगी है। अब बिहार में भी इसका प्रयोग होने लगा है।
भारत में गेहूँ रब्बी की फसल है। इसकी बुआई नवम्बर-दिसम्बर में होती है तथा मार्च-अप्रैल में काट ली जाती है। इस अवधि में ही भारत में गेहूँ उत्पादन की उपयुक्त दशा मिलती है। इसकी खेती में अधिक वर्षा और अधिक तापमान नुकसानदेह है। इसी कारण बंगाल-असम के महत्त्वपूर्ण धान क्षेत्र गेहूँ के प्रमुख क्षेत्र नहीं बन पाये हैं।


36. सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम और कृषि जलवायु नियोजन पर संक्षिप्त टिप्पणियां लिखें। ये कार्यक्रम देश में शुष्क भूमि कृषि विकास में कैसे सहायता करते हैं? (Write short notes on Drought Prone Area Programme and Agro climatic Planning. How do these programmes help in the development of dry land agriculture in the country ?)

उत्तर-  सूखा संभावी क्षेत्र विकास कार्यक्रम चौथी पंचवर्षीय योजना में प्रारंभ की गई और पाँचवी योजना में इसे विस्तृत किया गया। इसका उद्देश्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना और सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए उत्पादन के साधनों को विकसित करना था। इसके अतिरिक्त रोजगार के अवसर को बढ़ाने के लिए श्रम प्रधान सार्वजनिक निर्माण कार्य, सिंचाई योजनाएँ, भूमि विकास, वन रोपण, चारागाह विकास, बिजली उत्पादन, सड़क निर्माण, विपणन, ऋण सुविधाओं और सेवाओं के विकास पर जोर दिया गया। 1967 में योजना आयोग ने 67 जिलों को सूखा संभावी जिले के रूप में पहचाना और सिंचाई आयोग ने 1972 में 30% सिंचित क्षेत्र को मापदंड मानकर सूखा संभावी क्षेत्रों का सीमांकन किया। इन क्षेत्रों में मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, प० मध्य प्रदेश, मराठबाड़ा (महाराष्ट्र), रायलसीमा और तेलंगाना (आंध्रप्रदेश), कर्नाटक पठार और तमिलनाडु की उच्च भूमि और आंतरिक भाग सम्मिलित हैं। 1981 में की गई इस योजना की समीक्षा से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह कार्यक्रम कृषि आर संबंधित सेक्टर पर विशेष ध्यान देता है और सीमांत क्षेत्र में कृषि के विस्तार से पर्यावरण असंतुलन पैदा हो रहा है।

कृषि जलवायु नियोजन कार्यक्रम – कृषि जलवायु नियोजन कृषि विकास की प्रादेशिक योजना है, जिसे योजना आयोग ने प्रदेश की दृष्टि से संतुलित कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि तथा देश में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए शुरू की। इस योजना का उद्देश्य है-सतत् पोषणीय कषि विकास के लिए भूमि विकास और जल संचय की कार्य नीति तैयार करना, विभिन्न की कृषि-जलवायु दशाओं के अनुसार फसल और गैर-फसल आधारित विकास को सुनिश्चित करना, सार्वजनिक और निजी निवेश के द्वारा भूमि जल संचय की अवसंरचना का विकास और : कृषि जलवायु प्रदेशों/उप-प्रदेशों के सतत विकास के लिए संस्थागत सहायता, विपणन, कृषि प्रसंस्करण और अवसंरचना उपलब्ध कराना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पूरे देश को उच्चावच और जलवायु के आधार पर 15 बड़े प्रदेशों और उच्चावच तथा वर्तमान फसल प्रतिरूपों के आधार पर 127 उपप्रदेशों में विभाजित किया गया। प्रशासन की सुविधा के लिए जिलों को अंतिम रूप में योजना की इकाई के रूप में स्वीकार कर लिया गया है।
इन दोनों कार्यक्रमों से देश में शुष्क भूमि कृषि विकास में सहायता मिली।


37. हरित क्रांति की व्याख्या करें। (Explain green revolution.)

उत्तर-  1960 के दशक में भारत में खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि के लिए अपनायी गयी नीति को “हरित क्रांति” कहते हैं। वास्तव में, इस काल में अधिक उत्पादन देने वाली (HYV) गेहूँ (मैक्सिको) और चावल (फिलिपींस) की किस्मों को पैकेज प्रौद्योगिकी के रूप में पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश तथा गुजरात के सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्रों में, रासायनिक खाद के साथ अपनाया गया। इस प्रौद्योगिकी की सफलता हेतु सिंचाई से निश्चित जल आपूर्ति अपेक्षित थी। हरित क्रांति ने कृषि में प्रयुक्त कृषि निवेश, जैसे—उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्र आदि कषि आधारित उद्योगों तथा छोटे पैमाने के उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन दिया। कषि विकास की इस नीति से देश खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्म-निर्भर हुआ। लेकिन प्रारंभ में विशेषकर 1970 के दशक के अन्त तक “हरित क्रांति” देश में सिंचित भागों तक ही सीमित थी; इसके पश्चात् यह प्रौद्योगिकी मध्य भारत तथा पूर्वी भारत में फैली।
हरित क्रांति का दूरगामी प्रभाव यह हुआ कि रासायनिक खाद और अधिक सिंचाई के कारण कृषि भूमि का निम्नीकरण हुआ और उत्पादन में कमी होने लगी।


38. भारत में सिंचाई की आवश्यकता है। क्यों ?(India needs irrigation. Why ?).

उत्तर-  भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ की जलवायु मानसूनी है, अतः यहाँ कृषि की सफलता बहुत हद तक सिंचाई की समुचित व्यवस्था पर निर्भर है। ट्रेवेलियन के शब्दों में-
“भारत में सिंचाई ही सब कुछ है। पानी भूमि से अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जब भूमि में पानी दिया जाता है, तब भूमि की उर्वराशक्ति कम-से-कम छः गुना बढ़ जाती है। इतना ही नहीं, पानी ऐसी भूमि को भी बहुत अधिक मात्रा में उत्पादक बना देता है, जो उसके अभाव में कुछ भी उत्पादन नहीं कर सकती थी।”
इसी महत्त्व को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि “भारत में पानी सोना है” (Water in India is gold)।

भारत में सिंचाई का महत्त्व और आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है-
(i) अनिश्चित व अनियमित वर्षा
(ii) वर्षा का असमान वितरण
(iii) वर्षा का जल्द समाप्त हो जाना
(iv) वर्षा का मूसलाधार होना
(v) जाड़े में वर्षा का अभाव
(vi) गहन खेती करने के लिए


39. इंटरनेट (साइबर स्पेस) क्या है? (What is intermet or cyber space ?)

उत्तर-  इंटरनेट लिखित सूचनाओं के संचार का एक माध्यम है। यह दुनिया भर के विभिन्न प्रकार के कम्प्यूटरों को मॉडम (एक उपकरण) के माध्यम से जोड़ देता है। सारे संसार में अनेक संस्थाओं ने इंटरनेट पर अपनी-अपनी वेबसाइट खोल रखी है। कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर वेबसाइट अक्षर टाइप करते ही सूचनाओं का भंडार हमारे सामने उपस्थित हो जाता है।
साइबर स्पेस विद्युत द्वारा कम्प्यूटरीकृत स्पेस का संसार है, जो वर्ल्ड वाइड वेबसाइट जैसे इंटरनेट द्वारा घिरा हुआ है। यह भेजने वाले और प्राप्त करने वाले के शारीरिक संचलन के बिना कम्प्यूटर पर सूचनाओं के प्रेषण और प्राप्ति की विद्युतीय अंकीय दुनिया है। साइबर स्पेस हर जगह विद्यमान है, यथा कार्यालय में, चलती नौका में और उड़ते वायुयान में। प्रतिवर्ष लाखों नये ग्राहक इंटरनेट से जुड़ रहे हैं और इसके विस्तार की गति मानव इतिहास में अद्वितीय है। विश्व के अधिक प्रयोक्ता संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, चीन और भारत में हैं।


40. सतत पोषणीय विकास की अवधारणा का वर्णन करें। (Explain the concept of sustainable development.)

उत्तर-  संयुक्त राष्ट्रसंघ रिपोर्ट “आवर कॉमन फ्यूचर” के अनुसार “सतत पोषणीय विकास का अर्थ है एक ऐसा विकास जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता की पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति करना।” इसका अर्थ यह है कि मृदा या वन जैसे मूल्यवान संसाधनों का उपयोग इस गति से किया जाए ताकि इससे पर्यावरण संतुलन भी कायम रहे और इसका प्राकृतिक रूप से पुनरस्थापन या पुनश्चक्रण हो सके और भविष्य में लोगों के लिए भी ये संसाधन बचे रहें। इस प्रकार, सतत पोषणीय विकास के दो. दृष्टिकोण हैं पर्यावरणीय दृष्टिकोण और आर्थिक दृष्टिकोण। सतत पोषणीय विकास का उद्देश्य आज की और भावी पीढ़ियों के प्रत्येक व्यक्ति के बेहतर जीवन को सुरक्षित करना है। यह एक ऐसी सामाजिक प्रगति है, जिसमें प्रत्येक की आवश्यकता पूरी होती है, पर्यावरण की सुरक्षा होता है, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग होता है और आर्थिक वृद्धि और रोजगार के उच्च
और स्थिर स्तर बने रहते हैं।


S.N  Geography लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर ( 20 Marks )
1. Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 1
2. Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 2
3. Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 3
4. Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 4
5. Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 5
6. Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 6
7. Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 7
8. Geography ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) PART – 8
S.N Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर ) ( 15 Marks )
1. Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART – 1
2.  Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART – 2
3.  Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART – 3
4.  Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART – 4
5.  Geography ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART – 5
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