Class 12th Sociology ( समाज-शास्त्र ) ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) PART – 4


Q.46. भारत में हरित क्रांति के सामाजिक-आर्थिक परिणामों की व्याख्या कीजिए।

Ans हरित क्रांति शब्द सन् 1968 में होने वाले उस आश्चर्यजनक परिवर्तन के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो भारत के खाद्यान्न के उत्पादन में हुआ था तथा अब भी जारी है। हरित क्रांति से अभिप्राय है-कृषि उत्पादन में काफी अधिक वृद्धि होना और दीर्घकाल में कृषि उत्पादन के ऊँचे स्तर को स्थिर रखना। भारतीय अर्थव्यवस्था पर हरित क्रांति ने कई प्रकार से प्रभाव डाले हैं।

हरित क्रांति के प्रभाव :

1. उत्पादन में वृद्धि – हरित क्रांति के फलस्वरूप 1967-68 और उसके बाद के वर्षों में कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई है।

2. किसानों की समृद्धि – हरित क्रांति के फलस्वरूप किसानों की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ। उनका जीवन स्तर भी ऊँचा हो गया है। कृषि का व्यवसाय एक लाभकारी व्यवसाय माना जाने लगा है।

3. खाद्यान्न के आयात में कमी – हरित क्रांति के फलस्वरूप खाद्यान्न के आयात में कमी आई। भारत अनाज का एक निर्यातक देश बन गया।

4. उद्योगों का विकास – हरित क्रांति के कारण उद्योगों का भी विकास हुआ। कृषि यंत्र व उपकरण बनाने, रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई।

5. आर्थिक विकास – कृषि विकास से सरकार की आय में वृद्धि हुई। इससे देश में आर्थिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता के उद्देश्य को पूरा करने में सफलता मिली।

हरित क्रांति के सामाजिक प्रभाव – हरित क्रांति का प्रभाव सभी राज्यों में एक समान नहीं पड़ा। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु पर इसका अधिक प्रभाव पड़ा। इन राज्यों में कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई परंतु अन्य राज्यों में जहाँ सिंचाई व्यवस्था की कमी थी उसका हरित क्रांति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

धनी किसानों को लाभ – हरित क्रांति का लाभ केवल धनी किसानों को पहुँचा। बड़े किसान जिनके पास अधिक भूमि तथा धन था वे ही इसका लाभ उठा सके। हरित क्रांति का लाभ उन किसानों को पहुँचा जिनके पास 10 से 15 हेक्टेयर तक भूमि है। छोटे किसान हरित क्रांति को लाने वाले तत्वों जैसे उन्नत बीज, रासायनिक खाद, ट्यूबवैल, ट्रैक्टर आदि का खर्च नहीं उठा सकते थे। हरित क्रांति से धनी किसान समृद्ध हो गए।
हरित क्रांति के फलस्वरूप गाँवों में असमानता बढ़ गई। धनी किसान और अधिक ध नी हो गए जबकि निर्धन किसानों की आर्थिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। गाँवों में सामाजिक, आर्थिक तनाव बढ़ गया।


Q.47. उदारीकरण की प्रक्रिया को समझाइये। इसके परिणामों का उल्लेख कीजिए। अथवा, भारत में उदारीकरण के प्रभाव की विवेचना कीजिए।

Ans उदारीकरण भूमंडलीकरण का आर्थिक तत्व है। यह एक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत एक अत्यंत नियंत्रित अर्थव्यवस्था खुली दिखने वाली व्यवस्था के रूप में परिवर्तित हो जाती है। नियंत्रण और संचालन को कम करके आंतरिक अर्थव्यवस्था को उदार बनाया जाता है। राज्य का महत्व घटाकर निजी उद्यमियों और कंपनियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया जाता है। सार्वजनिक इकाइयों को समाप्त करके व्यवसाय व उद्योग का निजीकरण होता है। उदारीकरण का विचार इस सोच पर निर्भर है कि यदि राज्य का हस्तक्षेप कम हो तो अर्थव्यवस्था एवं समाज बेहतर होगा। इसे ‘कम राज्य-अच्छा राज्य’ जैसे नारों से लोकप्रिय बनाया गया है।
भूमंडलीकरण की प्रक्रिया विश्व की अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ जोड़ रही है। इस प्रक्रिया को उदारीकरण और निजीकरण के द्वारा आसान बनाया जा रहा है। विभिन्न देशों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं पर कम-से-कम सरकारी नियंत्रण रखकर उसे उदार बनाना होगा। उदारीकरण की नीति अर्थव्यवस्था की कार्य कुशलता पर जोर डालती है।
भारत में सन् 1991 में नई आर्थिक नीति की घोषणा की गई। नियंत्रित अर्थव्यवस्था के स्थान पर अधिकांश उद्यम निजी क्षेत्रों को सौंपे जा रहे हैं। भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया तेज की गई। नीतिगत सुधारों में अर्थव्यवस्था को उदार बना दिया। 1991-1994 की अवधि में व्यापार और उद्योग से नियंत्रण और संचालन को विघटित करने पर ध्यान दिया गया। कर व सीमाशुल्क को घटाया गया है। घरेलू व विदेशी दोनों विदेशों के लिए उपयुक्त वातावरण
का निर्माण किया गया है।
सुधार के दूसरे चरण में उदारीकरण व निजीकरण की प्रक्रिया और भी तेज हुई। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अधिक बढ़ावा दिया जा रहा है और सार्वजनिक क्षेत्र के आकार को छोटा किया जा रहा है।
भारत एक बड़ा बाजार है और इसमें सभी प्रकार के अवरोधों को समाप्त किया जा रहा है। अब बाजार विदेशी समान के लिए खुला हुआ है। सार्वजनिक क्षेत्र में उद्यमों में न केवल विनिवेश प्रारंभ हो गया है बल्कि कई निगमों को निजी क्षेत्र को बेच दिया गया है। भारत में उदारीकरण के दस वर्षों में विकास दर संतोषजनक रही है। मुद्रास्फीति को नियंत्रित कर दिया गया है। अब उद्योगों को सुरक्षा प्राप्त नहीं है। सूचना तकनीक के क्षेत्र में भारत आगे बढ़ा है। आने वाले वर्षों में सूचना तकनीक से संबंधित सेवाओं से अर्थव्यवस्था को और बढ़ावा मिल सकता है।
उदारीकरण की नीति अपनाई जा रही है, परंतु समस्याएँ बढ़ी हैं। भारत के 26 प्रतिशत लोग आज भी गरीबी रेखा के नीचे हैं। रोजगार की स्थिति गंभीर बनी हुई है। नौकरियाँ घट रही हैं। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना द्वारा लाखों लोग अलग हटा दिए गए हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था पर्याप्त रोजगार देने की स्थिति में नहीं है। पूर्ण रोजगार, संपूर्ण साक्षरता, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सभी नागरिकों के जीवन स्तर की गुणवत्ता में सुधार जैसे चुनौती भरे कार्यों को पूरा करना बाकी है।


Q. 48. उदारीकरण की आर्थिक नीति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

Ans उदारीकरण की आर्थिक नीति (Economic Policy of Liberalization)-भूमंडलीकरण में सामाजिक और आर्थिक संबंधों का विश्वभर में विस्तार सम्मिलित है। यह विस्तार कुछ आर्थिक नीतियों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। मुख्यालय इस प्रक्रिया को भारत में उदारीकरण कहा जाता है। ‘उदारीकरण’ शब्द से आशय ऐसे अनेक नीतिगत निर्णयों से है जो भारत राज्य द्वा 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व-बाजार के लिए खोल देने के उद्देश्य से लिए गए ये। इसके साथ ही, अर्थव्यवस्था पर अधिक नियंत्रण रखने के लिए सरकार द्वारा इससे पूर्व अपनाई जा रही नीति पर विराम लग गया। सरकार ने स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् अनेक ऐसे कानून बनाए थे जिनसे यह सुनिश्चित किया गया था कि भारतीय बाजार और भारतीय स्वदेशी व्यवसाय व्यापक विश्व की प्रतियोगिता से सुरक्षित रहें। इस नीति के पीछे यह अवधारणा थी कि उपनिवेशवाद से मुक्त हुआ देश स्वतंत्र बाजार की स्थिति में नुकसान में ही रहेगा। सरकार का यह भी विश्वास था कि अकेला बाजार ही संपूर्ण जन-कल्याण विशेष रूप से सुविधा-वंचित वर्गों के कल्याण का ध्यान, नहीं कर सकेगा। यह अनुभव किया गया कि जनसाधारण के कल्याण के लिए सरकार को भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।
अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का अर्थ था भारतीय व्यापार को नियमित करने वाले नियमों और वित्तीय नियमों को समाप्त कर देना। इन उपायों को ‘आर्थिक सुधार’ भी कहा जाता है। ये सुधार क्या हैं ? जुलाई 1991 से, भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपने सभी प्रमुख क्षेत्रों (कृषि, ‘उद्योग, व्यापार, विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी, सार्वजनिक क्षेत्र, वित्तीय संस्थाएँ आदि) में सुधारों की एक लंबी शृंखला देखी है। इसके पीछे मूल अवधारणा यह थी कि भूमंडलीकरण बाजार में पूर्व से ही अधिक समावेश करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी सिद्ध होगा।
उदारीकरण की प्रक्रिया के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष (आई. एम. एफ.) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से ऋण लेना भी आवश्यक हो गया। ये ऋण कुछ निश्चित शर्तों पर दिए जाते हैं। सरकार को कुछ विशेष प्रकार के आर्थिक उपाय करने के लिए वचनबद्ध होना पड़ता है; और इन आर्थिक उपायों के अंतर्गत संरचनात्मक समायोजन की नीति अपनानी होती है। इन समायोजनों का अर्थ सामान्यतः सामाजिक क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सामाजिक सुरक्षा में राज्य के व्यय में कटौती है। अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू. टी. ओ०) के संदर्भ में भी. यह बात कही जा सकती है।


Q. 49. भूमंडलीकरण से क्या अभिप्राय है ? भूमंडलीकरण की क्षमता का उल्लेख कीजिए। अथवा, एक भूमंडलीकरण अर्थव्यवस्था के विशिष्ट लक्षण क्या हैं ?

Ans  भूमंडलीकरण शब्द का प्रयोग आर्थिक अर्थ में किया जाता है। इस दृष्टि से भूमंडलीकरण बाजार की स्थिति में विश्व की अर्थव्यवस्थाओं के एकीकरण की प्रक्रिया है। मुक्त बाजार में व्यापार और पूँजी का मुक्त प्रवाह है तथा लोगों का राष्ट्रीय सीमाओं के पार जाना शामिल है।
भूमंडलीकरण की पहचान नई विश्व व्यापार व्यवस्था तथा व्यावसायिक बाजारों के खुलने से है। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी ने भूमंडलीकरण के प्रसार में काफी सहायता की है। इस प्रक्रिया को सूचना के तत्काल प्रसार के लिए विकसित तकनीक ने सरल बना दिया है।
1970 तक भूमंडलीकरण के विचार में रुकावटें आईं। भूमंडलीकरण की प्रवृत्ति को पिछले दस वर्षों में नया प्रोत्साहन मिला है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है। 1998 में इन कंपनियों की बिक्री विश्व व्यापार की एक-तिहाई थी। ये नियम पूरे संसार को एक बाजार समझते हैं। विदेशी व्यापार की मात्रा को बढाने के उद्देश्य से कर एवं सीमा शुल्क को घटाने तथा अन्य बाधाओं को दूर करने के परिणामस्वरूप देश की सीमाओं से बाहर व्यापार तेजी से बढ़ रहा है। यातायात और संचार पर होने वाले खर्च अपेक्षाकृत कम हो गए हैं। भूमंडलीकरण ने बहु-राष्ट्रीय निगमों के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं।
भूमंडलीकरण की क्षमता अथवा लक्षण – भूमंडलीकरण की प्रक्रिया बाजार के मुख्य सिद्धांत पर आधारित है। ऐसा माना जाता है कि यह मुक्त बाजारीकरण प्रतियोगिता करता है
और कार्यदक्षता को बढ़ाता है जिसका नियंत्रित बाजारों में अभाव होता है। बढ़ी हुई कार्यदक्षता सामानों तथा सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाती है। यह पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं के विकास में सहायक है। भूमंडलीकरण की स्थिति में आंतरिक अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश प्रचुर मात्रा में होती है, जो इसे मजबूत और तेज बनाता है। ये निवेश उन देशों को सहायता पहुँचाते हैं जो आंतरिक संसाधनों की कमी का सामना कर रहे हैं। इस प्रकार विदेशी पूँजी तथा वस्तुओं के अनियंत्रित प्रवाह की मुक्त द्वार नीति अपनाई जाती है जिससे अपेक्षा की जाती है कि यह तीसरी दुनिया की मंद अर्थव्यवस्था को तेज गति प्रदान करेगी।
अधिकतर विकासशील देशों में बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है अतः भूमंडलीय को इस समस्या के समाधान का उपाय माना जा रहा है। भूमंडलीकरण रोजगार के अवसरों में वृद्धि की गारंटी देता है तथा अधिक रोजगार और आर्थिक विकास के द्वारा जीवन की गुणवत्ता में सुधार लायेगा। अर्थव्यवस्था के एकीकरण से जो आर्थिक विकास होगा, वह स्वयं ही सामाजिक न्याय के सवाल को सुलझा देगा। ऐसा कहा जाता है कि अर्थव्यवस्था का उदारीकरण वंचित समूहों के लिए एक नई आशा की किरण लेकर आएगा। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भूमंडलीकरण व्यावसायिक सहयोग और भाईचारे में वृद्धि करेगा। वह राष्ट्रों के बीच आदान-प्रदान तथा स्थापना के माध्यम से विश्व शांति और मैत्री का युग लायेगा।


Q. 50. भूमंडलीकरण के परिणाम बताइये।
अथवा, संस्कृति पर भूमंडलीकरण का प्रभाव बताइए।

Ans संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के अनुसार भूमंडलीकरण का युग संसार के लाखों लोगों के लिए निर्धनता दूर करने में सहायता करेगा।
विकासशील देशों में अभी तक जो अनुभव किया गया है वह इस तथ्य की पुष्टि नहीं । करता। यह उन देशों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा है जो अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं हैं। व्यापार में वृद्धि, नई प्रौद्योगिकी, विदेशी निवेश और इंटरनेट के विस्तार ने विश्व में आर्थिक विकास की गति को बढ़ाया है परंतु विभिन्न देशों को आर्थिक विकास का लाभ समान रूप से नहीं मिला है क्योंकि बाजार व्यवस्था मनाफे की खोज में लगी रहती है। मुक्त प्रतियोगिता बाजार कार्यकुशलता की गारंटी तो दे सकता है परंतु अनिवार्य रूप में समानता को सुनिश्चित नहीं कर सकता। यह संसार के विकासशील देशों में असमानता में वृद्धि कर रहा है। एशिया और अफ्रीका के देशों में फैलते बाजार के विकास के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों में जनसंख्या का पलायन हो रहा है। धन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। नगरीय जीवन की मूल्यहीनता में वृद्धि हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं ने विश्व पूँजीवाद की विचारधारा को प्रबल बनाया है। ये संगठन विश्व बाजार के लिए राजनीतिक और कानूनी स्थितियों का निर्माण करते हैं। इन स्थितियों
के निर्माण के लिए कई कदम उठाए गए हैं। ये कदम हैं –
1. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं सेवाओं की बाधाओं का निराकरण।
2. पूँजी का स्थानान्तरण।
3. संपत्ति के अधिकारों की विश्व के पैमाने पर सुरक्षा।
4. राज्य की कंपनियों का निजीकरण।
5. व्यावसायिक कार्यों का अनियमन।
6. कल्याण सेवाओं को क्रमशः समाप्त करना।
इन सभी कदमों ने जनता को आवश्यक सामाजिक सेवाएँ प्रदान करने की राष्ट्रों की क्षमता को घटा दिया है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक द्वारा विकासशील देशों को अपने खर्च घटाने के लिए विवश किया जा रहा है। इससे जनसंख्या के वंचित समूहों के लिए उपलब्ध शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण को घटा दिया है। इन सुविधाओं को केवल सुविधा प्राप्त व्यक्तियों तक सीमित रखा गया है।
आज विकासशील देशों के लिए लाभ और अवसरों की अपेक्षा खतरे अधिक हैं। रोजगार पर इसका सबसे अधिक असर पड़ा है। एशिया के देशों में 1997-98 के मंदी के दौर में बेरोजगारी दुगनी हो गई। अधिकांश देशों में श्रमिकों की सौदेबाजी की क्षमता कम हो गई है। वास्तविक मजदूरी में कमी आई है। प्रायः सभी देशों में गरीबी बढ़ रही है। विकास का लाभ समान रूप से नहीं मिल रहा है। निर्धन और अधिक निर्धन होते जा रहे हैं। भूमंडलीकरण आर्थिक संबंधों को जटिल बनाता है। आर्थिक सत्ता बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथ में केन्द्रित करता है। भूमंडलीकरण सामान्य नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को सीमित करता है। यह सामाजिक नीति पर प्रभाव डालता है और राज्य की भूमिका को कम करता है। विकासशील देशों की जनता कृषि सेवाओं और पेटेंट अधिकारों जैसे सवालों पर चल रहे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों से चिंतित है क्योंकि इनसे विकासशील देशों को न्याय नहीं मिलेगा।


Q.51. भूमंडलीकरण ने संचार व्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित किया है ?

Ans  विश्व में प्रौद्योगिकी के क्षेत्र और दूरसंचार के आधारभूत ढाँचे में हुई महत्वपूर्ण उन्नति के परिणामस्वरूप भूमंडलीय संचार व्यवस्था में भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। अब कछ घरों और बहत-से कार्यालयों में बाहरी दुनिया के साथ संबंध बनाए रखने के अनेक साधन उपलब्ध हैं; जैसे-टेलीफोन (लैंडलाइन और मोबाईल दोनों किस्मों के), फैक्स मशीनें, डिजिटल और केवल टेलीविजन, इलेक्ट्रॉनिक मेल और इंटरनेट आदि।
आप में से कुछ को ऐसी बहुत-सी जगहों के बारे में पता होगा और कुछ को नहीं भी होगा। हमारे देश में इसे अक्सर ‘डिजिटल विभाजन’ का सूचक माना गया है। इस डिजिटल विभाजन के बाद भी प्रौद्योगिकी के ये विविध रूप समय और दूरी को तो संकुचित या कम करते ही हैं। इस ग्रह पर दो सुदूर विपरीत दिशाओं-बंगलूरु और न्यूयार्क में-बैठे दो व्यक्ति न केवल बातचीत कर सकते हैं, बल्कि दस्तावेज़ और चित्र आदि भी एक-दूसरे को उपग्रह प्रौद्योगिकी की सहायता से भेज सकते हैं।
मोबाइल टेलीफोन में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है और अधिकांश नगर में रहने वाले मध्यवर्गीय युवाओं के लिए सेलफोन उनके अस्तित्व की हिस्सा बन गए हैं। इस प्रकार सेलफोनों के इस्तेमाल में भारी वृद्धि हुई है और उनके प्रयोग के तरीकों में भी काफी बदलाव दिखाई देता है।


Q.52. वैश्वीकरण क्या है ? इसके सामाजिक प्रभावों की चर्चा करें। अशवा. भमण्डलीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रभावों का वर्णन करें।

Ans वैश्वीकरण का तात्पर्य विश्व की अर्थव्यवस्था में एकीकरण की प्रक्रिया से है। इसका अर्थ है जब विभिन्न देशों के बीच व्यापारिक प्रतिबन्ध कम या समाप्त होने लगते हैं तथा सभी देश एक-दूसरे की प्रौद्योगिकी और अनुभवों का लाभ उठाकर अपना आर्थिक विकास करने लगते हैं तब इस दशा को वैश्वीकरण या भूमण्डलीकरण कहा जाता है।
वैश्वीकरण के जो अच्छे परिणाम सामने आये हैं, वे निम्नलिखित हैं –
1. यह प्रक्रिया देश के प्राकृतिक साधनों का सही उपयोग करने और कम कीमत पर उपभोक्ताओं को अच्छी वस्तुएँ उपलब्ध कराने में सहायक सिद्ध हुई है।
2. विकासशील और पिछड़े देशों में दूसरे देशों के लोग पूँजी का निवेश करने लगते हैं। अतः ऐसे देशों में भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बढ़ने लगती है।
3. वैश्वीकरण के कारण रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है। आज बड़ी संख्या में लोग दूसरे देशों में जाकर रोजगार के अवसर प्राप्त कर लेते हैं।
4. विकसित देशों ने खेती के ऐसे तरीके और उपकरण विकसित किये हैं जिनके द्वारा कम भूमि पर अधिक उत्पादन किया जा सकता है। ऐसे ज्ञानों का लाभ वैश्वीकरण के कारण अविकसित देशों को भी मिलने लगा है। फलतः कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है।
5. वैश्वीकरण के फलस्वरूप जब वस्तुओं की गुणवत्ता बढ़ती है तो जीवन स्तर में सुधार होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के स्तर में भी सुधार होता है।
6. यह महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरुक बनाने में भी योगदान किया है।
7. विभिन्न देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाने में भी इसकी मुख्य भूमिका है।


Q.53. महिला आंदोलन पर एक समाजशास्त्रीय निबंध लिखें।

Ans भारतीय समाज में 19वीं शताब्दी के आरम्भ से ही महिलाओं की निम्न स्थिति के प्रति चिंता प्रारम्भ हो गयी थी। सर्वप्रथम सन् 1828 में राजा राम मोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना कर सती प्रथा के विरोध में आंदोलन किया। फलतः सन् 1829 में सती प्रथा के विरोध में कानून पारित हुआ। ब्रह्म समाज ने बाल विवाह के विरुद्ध और महिला शिक्षा के प्रसार के लिए भी आंदोलन किया। राजाराम मोहन राय द्वारा शुरू किये गये महिला सुधार के कार्यों को ईश्वरचन्द विद्यासागर ने आगे बढ़ाया। इन्होंने विधवा समस्या को उठाते हुए विधवा पुनर्विवाह के लिए प्रयास किया और स्त्री शिक्षा के लिए भी विशेष प्रयास किया।
इसके बाद आर्य समाज की स्थापना कर दयानन्द सरस्वती ने भारतीय समाज की कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन किया। इन्होंने स्त्रियों की उन्नति के लिए एक बौद्धिक चेतना उत्पन्न की, जिसके फलस्वरूप स्त्रियाँ निर्भयतापूर्वक अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने में सक्षम हुई।। इन्होंने वैदिक काल के समान एक समतावादी सामाजिक संरचना स्थापित करने का काम करने । के साथ ही स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में भी व्यापक प्रयास किया। स्वामी विवेकानन्द ने भी स्त्रियों की समानता और समाज में उन्हें सम्मानजनक स्थान दिलाने की वकालत की।
स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हुए महर्षि कार्वे ने महिला विश्वविद्यालय की स्थापना । करके समाज में स्त्री शिक्षा के प्रति जागरूकता पैदा करने में विशेष योगदान दिया।
इस प्रकार भारत में महिला आन्दोलन का सम्बन्ध पुनर्जागरण से उत्पन्न होने वाली-उस चेतना से है जिसने महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार करने की प्रेरणा दी। लेकिन आज भी भारतीय समाज में महिला आन्दोलन अत्यन्त अविकसित अवस्था में है। समय विशेष पर किसी समस्या को लेकर महिलाओं के जागरुक संगठनों के द्वारा कुछ प्रदर्शन करने या ज्ञापन सौंपने जैसे कार्य अवश्य हुए हैं। पर कोई ऐसा महिला संगठन या महिला आंदोलन नहीं हुआ, जिसे महिला सामाजिक आंदोलन का नाम दिया जाय।


Q. 54. युवा गृह पर एक निबंध लिखें। अथवा, घुमकरिया से क्या समझते है ?

Ans  घुमकरिया – जनजातीय समाजों में युवाओं के संगठन को युवागृह कहा जाता है। अभी संगठन को ओराँव जनजाति में घुमकरिया कहा जाता है। यह जनजातीय सामाजिक संगठन का प्रमुख अंग होता है जहाँ गाँव के युवा अपने घर से बाहर गाँव के बीच में या किनारे बने एक बड़े कमरा में रहते हैं। एक- आयु सीमा से कम या ज्यादा होने पर स्वतः उनकी समस्या समाप्त हो जाती है। रात में लड़के-लकड़ियाँ आपस में नाच-गाकर जनजातीय संस्कृति,कला और यौन शिक्षा प्राप्त करते हैं। यह समाजीकरण का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र होता है। उसका विकास शायद जनजातियों युवाओं की अपने माता-पिता के नीति जीवन से ज्ञात हो । कि जनजातियों के पास बड़े घर नहीं बल्कि छोटे आवास होते हैं, उसे अलग करने के लिए बना होगा। कुछ लोगों का विचार है कि इसका निर्माण गाँव की सुरक्षा के लिए भी बना होगा, क्योंकि पहले दूसरे दुश्मन जातियों से गाँव पर हमेशा खतरा बना रहता था और आक्रमण की स्थिति में गाँव के सभी युवा एक जगह किसी भी स्थिति का सामना करने में सक्षम रहते होंगे। लेकिन अब आधुनिकता के प्रमुख में ये संगठन विलुप्त हो रहे हैं।


Q.55. उपनिवेशवाद से आप क्या समझते हैं ? उपनिवेशवाद की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

Ans वह दशा जिसमें एक शक्तिशाली देश अपने से निर्बल देश पर अधिकार करके वहाँ अपना शासन और कानून व्यवस्था स्थापित कर लेता है तो उसे उपनिवेशवाद कहा जाता है। इसका संबंध साम्राज्यवादी व्यवस्था से रहा है। इंगलैंड, फ्रांस आदि यूरोपीय देश उपनिवेशवाद के पोषक रहे हैं।
उपनिवेशवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. उपनिवेशवाद में एक साम्राज्यवादी देश अपने से दुर्बल देश पर अधिकार करके वहाँ अपना शासन और कानून व्यवस्था स्थापित कर लेता है।

2. एक देश जब किसी विदेशी ताकत के अधीन हो जाता है तो उसके मूल निवासियों को अपने देश के शासन तंत्र में हिस्सा लेने का कोई अधिकार नहीं रहता है।
3. उपनिवेशवाद शक्तिशाली राष्ट्रों की विस्तारवादी प्रकृति को स्पष्ट करता है।

4. उपनिवेशवाद एक दीर्घकालीन शोषण की नीति पर आधारित दशा है। इसका उद्देश्य । उस देश के संसाधनों का उपयोग इस तरह करना होता है जिससे साम्राज्यवादी देश आर्थिक रूप से शक्तिशाली बन सके।

5. औपनिवेशिक शासन में लोगों पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अपनी संस्कृति, सामाजिक मूल्यों और आर्थिक क्रियाओं में परिवर्तन लाने के लिए इस तरह दबाव डाला जाता है, जिससे वे स्वयं भी अपने आपको साम्राज्यवादी शक्ति के अधीन समझने लगे।

6. विदेशी सरकार द्वारा कूटनीति की सहायता से ऐसी व्यवस्था लागू की जाती है जिससे उस देश के मूल निवासी अपना सामाजिक-आर्थिक विकास करने के योग्य बन सके।

7. उपनिवेशवाद का एक पहलू रंगभेद के आधार पर कानूनों और न्याय व्यवस्था को लागू करना होता है।

8. विश्व में सबसे अधिक उपनिवेश के देश बने जो एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों से संबंधित थे।


Q. 56. भारतीय समाज पर जनाधिक्य के कुप्रभावों का वर्णन करें।

Ans भारतीय समाज पर जनाधिक्य के निम्नलिखित कुप्रभाव पड़े हैं –

1. आर्थिक विकास अवरुद्ध होना – यों तो मानव संसाधन विकास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है, परन्तु जनाधिक्य विकास के मार्ग को अवरुद्ध करता है। इसके कारण अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक भार पड़ता है जिससे आर्थिक विकास को धक्का लगता है।

2. खाद्य समस्या का संकट – जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि के कारण देश में खाद्य समस्या का संकट बना रहता है। अतिरिक्त जनसंख्या को खाद्यान्न उपलब्ध कराना सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती है।

3. मूल्य वृद्धि – जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण बाजार में अतिरिक्त माँग होती है। इसके कारण कीमत में वृद्धि होती है और सामान्य लोगों का जीवन स्तर गिरता है।

4. गरीबी – अर्थव्यवस्था में जनसंख्या में वृद्धि के कारण गरीबी बढ़ती है। उपभोग पर उत्पादन का अधिकांश हिस्सा खर्च हो जाता है। ऐसी अर्थव्यवस्था में पूँजी निर्माण की दर धीमी होती है।

5. बेरोजगारी – भारत में जनसंख्या में वृद्धि के कारण प्रति वर्ष श्रमिकों की संख्या में वृद्धि हुई, परन्तु रोजगार सृजन दर में वृद्धि नहीं हुई। फलतः देश में बेरोजगारी एक गंभीर समस्या बनी हुई है।

6. पर्यावरण संकट – पर्यावरण पर जनाधिक्य का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। जनाधिक्य के कारण वनों की कटाई, प्रदूषण आदि में वृद्धि हुई जिसका पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। वायुमण्डल में कार्बन डाईऑक्साइड गैस की मात्रा लगातार बढ़ रही है जो अत्यधिक ताप के लिए उत्तरदायी है।


Q. 57. भारतीय समाज में मौजूद अनेकता में एकता के तत्वों को स्पष्ट करें।

Ans भारतीय समाज का निर्माण अनेक नस्लों, धर्मों, सांस्कृतियों एवं विचारों के लोगों से मिलकर हुआ है।
संविधान के अनुसार सभी धर्मों का स्वागत है तथा अपने धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत करने की स्वतंत्रता है। सभी को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त है। सभी के वयस्क मताधिकार का अधिकार है। विचारों की अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म तथा उपासना की स्वतंत्रता एवं प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार और भाईचारे की भावना के विकास पर जोर दिया गया है। विभिन्न अवसरों पर हिन्दू तथा मुस्लिम आदि एक-दूसरे का सहयोग करते हैं और इस प्रकार भारतीय समाज में अनेकता में एकता के कारण स्थायित्व एवं निरतरता पायी है। कन्याकुमारी से कश्मीर तक अनेक धर्म, विश्वास संस्कृति, भाषा, वेशभूषा, प्रजाति आदि के होते हुए भी हम सब भारतीय होने का गर्व करते हैं। यही है अनेकता में एकता।


Q. 58. भारत में औपनिवेशिक शासन के कारणों की विवेचना करें।

Ans एक लम्बी अवधि तक भारत इंगलैंड का उपनिवेश रहा। यहाँ औपनिवेशिक शासन अनेक कारणों का परिणाम था। इसका सबसे मुख्य कारण राजनीतिक अस्थिरता था।
दूसरा कारण यह था कि जागीरदारों तथा राजाओं के अधिकारियों ने आम जनता का शोषण करना आरम्भ कर दिया था।
तीसरा कारण आवागमन तथा संचार की सुविधाओं का अभाव था। यहाँ के निवासी अपने ही क्षेत्र से बँधे रहे। उन्हें दूसरे क्षेत्र में घटने वाली घटनाओं का पता नहीं चल पाता था।
चौथा कारण अलग-अलग क्षेत्रों की सांस्कृतिक भिन्नता थी। इसके कारण विभिन्न क्षेत्रों के बीच संतुलन और सामंजस्य नहीं हो सका।
पाँचवाँ कारण यह था कि यहाँ की आबादी अनेक जातियों तथा सम्प्रदायों में विभाजित थी। इनके बीच सामाजिक दूरी पायी जाती थी।
छठा कारण शिक्षा का अभाव था। इस वजह से सामाजिक कुरीतियाँ चरम सीमा पर पहुँच गयी थी। देश में कोई ऐसी सत्ता नहीं थी जो लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने और उनमें सामाजिक चेतना पैदा करने का काम कर पाती।
भारत में लम्बी अवधि तक औपनिवेशिक शासन के लिए यही कारण उत्तरदायी है।


Q.59. जातिवाद क्या है ? इसे प्रोत्साहन देने वाले चार कारणों की चर्चा करें।

Ans जातिवाद हिन्दू जाति व्यवस्था का एक दूषित रूप है। यह एक उग्र भावना है जो एक जाति के सदस्यों को बिना किसी कारण के अपनी जाति के लोगों का पक्ष लेने के लिए प्रेरित करती है। निम्नलिखित कारण जातिवाद को प्रोत्साहन देने के लिए उत्तरदायी हैं –
अन्तर्विवाह का प्रचलन जातिवाद के विकास का सबसे बड़ा कारण है। अन्तर्विवाह के नियम के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही जाति या उपजाति में विवाह करना पड़ता है। फलतः जाति आत्मकेन्द्रित समूह के रूप में बदल गयी और वह प्रत्येक दशा में अपनी जाति के सदस्यों का पक्ष लेने लगी।
दूसरा कारण जातीय संगठन है। यह संगठन जातिगत पक्ष न लेने वाले व्यक्तियों की निन्दा और बहिष्कार करते हैं तथा अपनी जाति की सर्वाधिक सेवाएँ प्रदान करने वाले को सम्मानित करते हैं। जातीय संगठन की यह कार्य प्रणाली प्रत्यक्ष रूप से जातिवाद को प्रोत्साहित करती है।
तीसरा कारण जाति समूहों का असमान विकास है। आजादी मिलने के बाद कुछ जातियों को शिक्षा, नौकरियों और व्यवसाय के अधिक अवसर मिले, जबकि कुछ जातियाँ इससे वंचित रहीं। इससे विभिन्न जातियों के बीच कटुता बढ़ी तथा जातिवाद के आधार पर सभी जातियाँ संगठित होकर अधिक अधिकारों की माँग करने लगी।
चौथा कारण जजमानी प्रथा का विघटन है। इस प्रथा के अन्तर्गत गाँव या समुदाय में रहने वाली जातियाँ एक-दूसरे को अपनी सेवाएँ देती थीं तथा प्रत्येक जाति अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए दूसरी जाति पर निर्भर रहती थी। इस प्रथा के विघटित होने से प्रत्येक जाति एक स्वतंत्र इकाई बन गई। एक जाति के सदस्य विभिन्न प्रकार के व्यवसाय और सेवा करने लगे। आरम्भ में यह दशा व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया और बाद में यही प्रतिस्पर्धा जातिवाद को प्रोत्साहन देने लगी।


S.N Class 12th Sociology ( लघु उत्तरीय प्रश्न )
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